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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 34
भीता रुवन्ति कुकुकुक्विति ताम्रचूडा- स्त्यक्त्वा ताराणि रुतानि भयदान्यपराणि रात्रौ । स्वभावविरुतानि निशावसाने राष्ट्रपुरपार्थिववृद्धिदानि ॥
रात्रि में भयभीत हुये मूर्गों के 'कुकुकुकु' शब्दों को छोड़कर शेष सभी प्रकार के शब्द भय देने वाले होते हैं तथा रात्रि के अन्त में स्वस्थ होकर तार स्वर से शब्द करे तो राज्य, पुर और राजा को बुद्धि करने वाले होते हैं।
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