इंहंगुग्लुगिति प्रिंणुमभिलषन् क्रोशत्युलूको मुदा पूर्णः स्याद् गुरुलु प्रदीप्तमपि च ज्ञेयं सदा किस्किसि । विज्ञेयः कलहो यदा बलबलं तस्यासकृद्वाशितं दोषायैव टटट्टटेति न शुभाः शेषास्तु दीप्तस्वराः ॥
अपनी प्रिया की अभिलाषा करता हुआ उल्लू आनन्द से 'हुहुँगुगुलुक' शब्द करता है। इसका 'कुरुलु' शब्द पूर्ण है। 'किस्किसि' शब्द सदा प्रदीप्त है। जब उल्लू का बार-बार 'बलबल' शब्द हो तो कलह, 'टटट्टट' शब्द दोष करने वाला और शेष सभी शब्द दीप्त होते हैं।
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