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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 41
एको निशीथेऽनलदिक्स्थितश्च दिव्येतरैस्तां शपथैर्नियोज्य । पृच्छेद्यचाचिन्तितमर्थमेवमनेन मन्त्रेण यथामृणोति ॥
मध्य रात्रि के समय एकाको अग्निकोण में स्थित होकर दिव्य और लौकिक रुपयों में सम्बोधन करते हुये जिस प्रकार से यह सुने, उस प्रकार से यक्ष्यमात्र मन्त्रो के द्वारा पूर्व चिन्तित अर्थ की सिद्धि को पूछना चाहिये ।
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