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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 46
अवाक्प्रदानेऽपि हितार्थसिद्धिः पूर्वोक्तदिक्चक्रफलैरतोऽन्यत् । वाच्यं फलं चोत्तममध्यनीचशाखास्थितायां वरमध्यनीचम् ॥
इसके अतिरिक्त पूर्वकथित दिक्चक्र फल के द्वारा इसका फल कहना चाहिये। यदि पिङ्गला प्रधान शाखा पर बैठी हो तो उत्तम, मध्य शाखा पर बैठी हो तो मध्यम और नीचे वालो शाखा पर बैठी हो तो अल्प फल देने वाली होती है।
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