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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 43
आपृच्छेऽद्य गमिष्यामि वेदितश्च पुनस्त्वहम् । प्रातरागम्य पृच्छे त्वामाग्नेयीं दिशमाश्रितः ॥
आज पूछ कर मैं जाऊँगा, फिर प्रात:काल में जानने बाला मैं आकर अग्निकोण में स्थित होकर पूहूँगा। तुम भी जो मैं पूछता हूँ,
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