स्रोतस्तडागभेरीकपुत्रकः कलहकारिका च रला। भृङ्गारवच्च विरुवति निशि भूमौ यङ्गुलशरीरा ॥
स्रोतोभेद्य, तडागभेद्य और कलहकारिका- ये रता को संज्ञाये है। यह रता दो अंगुल की होती है और रात्रि में पृङ्गार की तरह शब्द करती है।
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