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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 37
सारसकृजितमिष्टफलं तद्यद्युगपद्विरुतं मिथुनस्य । एकरुतं न शुभं यदि वा स्यादेकरुते प्रविरोति चिरेण ॥
यदि सारस के जोड़े का एक साथ शब्द हो तो इष्ट फल देने वाला होता है। एक सारस का शब्द शुभ नहीं है। यदि एक के शब्द करने के बाद दूसरा देर तक शब्द करता रहे तो भी शुभ देने वाला नहीं होता।
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