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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 31
फेण्टकस्य वामतश्चिरिल्विरित्विति स्वनः । शोभनो निगद्यते प्रदीप्त उच्यतेऽपरः ॥
यदि गमन करने वाले के वाम भाग में फेण्ट 'चिरिल्चिरितु' शब्द करे तो शुभ फल देने वाला होता है। इसके अतिरिक्त उसके शब्द दीप्त होते हैं।।३१।। बामतो वामभागे फेण्टकश्चिरित्विरित्विति स्यनं शब्दं यदि करोति, तदा शोभनः शुभफलप्रदो निगद्यते कथ्यते। अपरोऽन्यः प्रदीप्त उच्यते कथ्यत इति।
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