केकेति पूर्णकुटवद्यदि वामपार्श्वे चाषः करोति विरुतं जयकृत्तदा स्यात् । क्रेक्रेति तस्य विरुतं न शिवाय दीप्तं सन्दर्शनं शुभदमस्य सदैव यातुः ॥
यदि चाष वाम पार्श्व में आकर करायिका की तरह 'केका' शब्द करे तो जयकारी होता है। उसका 'क्रक्र' यह दीप्त शब्द कुशलकारी नहीं होता, किन्तु इसका दर्शन गमन करने वाले के लिये सदा शुभप्रद होता है।
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