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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 19
फणिनोऽभिमुखागमोऽरिसङ्गं कथयति बन्युवधात्ययं च यातुः । अथवा समुपैति सव्यभागात्र स सिद्धचै कुशलो गमागमे च ॥
यदि गमन करने वाले के सम्मुख सर्प आ जाय तो शत्रुसमागम तथा बन्धुओं के वध और विनाश को सूचित करता है। यदि गमनसमय में दक्षिण भाग से वाम भाग में सर्व आ जाय तो कार्यसिद्धि के लिये नहीं होता है।
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