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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 24
चाषस्य काकेन विरुध्यतश्चेत् पराजयो दक्षिणभागगस्य । वधः प्रयातस्य तदा नरस्य विपर्यये तस्य जयः प्रदिष्टः ॥
काक के साथ लड़ाई करते हुये चाष की काक से दक्षिण भाग में पराजय हो जाय तो गमन करने वाले मनुष्य का चप होता है। इससे विपरीत (काक से उत्तर भाग में चाप की जय) हो तो गमन करने वाले की जय होती है।
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