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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 29
चिक्चिकिवाशितमेव तु कृत्वा दक्षिणभागमुपैति तु वामात्। क्षेमकृदेव न साधयतेऽर्थान् व्यत्ययगो वधवन्यभवाय ॥
यदि यही भाण्डरीक पक्षी 'चिश्चिक' शब्द करके गमन करने वाले के माम भाग से दक्षिण भाग में आ जाय तो क्षेम करने वाला होता है, किन्तु अभीष्ट अर्थ की सिद्धि नहीं करता है। इससे उलटा हो (दक्षिण भाग से वाम भाग में आ जाय) तो वप, बन्धन और भय को करता है।
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