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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 8
गर्ताकुक्कुटकस्य प्रथितं तु कुलालकुक्कुटो नाम। गृहगोधिकेति संज्ञा विज्ञेया कुड्यमत्स्यस्य ॥
यह भाण्डरीक पूर्व देश-निवासियों के दक्षिण भाग में और अन्य देश-निवासियों के नाम भाग में आने में ४२७ शुभ होता है। धिक्कार मृग जाति को और मुर्गे को कहते हैं।
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