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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 18
शखं वामे दर्शनं दिव्यकस्य सिन्डिज्ञेया हस्तमात्रोच्छ्रितस्य । तस्मिन्नेव प्रोत्रतस्थे शरीराद् धात्री वश्यं सागरान्ताभ्युपैति ॥
यदि गमन करने वाले के वाम भाग में धन्वन पक्षी हो तो शुभ, उसी बाम भाग में पृथ्वी से एक हाथ ऊँचे प्रदेश पर हो तो इश कार्यों की सिद्धि करने वाला एवं काफी उच्च प्रदेश पर हो तो समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को वश में करने वाला होता है ।
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