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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 30
यदि यही भाण्डरीक पक्षी 'चिश्चिक' शब्द करके गमन करने वाले के माम भाग से दक्षिण भाग में आ जाय तो क्षेम करने वाला होता है, किन्तु अभीष्ट अर्थ की सिद्धि नहीं करता है। इससे उलटा हो (दक्षिण भाग से वाम भाग में आ जाय) तो वप, बन्धन और भय को करता है।
जो मैना 'क्रक्र' शब्द को या भयरहित होकर 'जे' शब्द करे, यह गमन करने पाले के शरीर से शीघ्र रधिर निकलने को सूचित करती है।
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