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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 32
श्रेष्ठं खरं स्थास्नुमुशन्ति वाममोङ्कारशब्देन हितं च यातुः । अतोऽपरं गर्दभनादितं यत् सर्वाश्रयं तत् प्रवदन्ति दीप्तम् ॥
गमन करने वाले के बाम भाग में स्थित गदहा श्रेष्ठ है। यदि वह ओंकार शब्द करे तो गमन करने वाले का हित होता है। इसके अतिरिक्त गदड़े के सभी प्रकार के शब्द दीप्त कहे जाते हैं।
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