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अध्याय 51 — अथाङ्गविद्याध्यायः
बृहत्संहिता
46 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रश्नकर्ता की दिशा, उसकी वाणी, उसका स्थान और उससे लाई हुई वस्तु को देखते हुये, प्रश्नकर्ता के अपने और वहाँ पर स्थित दूसरे के अंग को घटना देखकर तथा समय को अपनी बुद्धि से विचार कर दैवज्ञ को शुभाशुभ फल कहना चाहिये; क्योंकि वह काल चराचर सब प्राणियों का आत्मस्वरूप होने के कारण विभु और सबको देखने बाला होता है। वही चेष्टा और चचनों के द्वारा प्रश्नकर्ता को शुभाशुभ फल दिखाता है।
जहाँ पुष्परूप सुन्दर मुसुकानयुत, बहुत से फलों से भरा हुआ, निर्मल छाल और पत्ते वाले, अशुभ पक्षियों से रहित और प्रशस्त संज्ञा वाले वृक्ष की छाया से आच्छादित तथा सम (बराबर) भूमि हो; देवता, ऋषि, ब्राह्मण, साधु या सिद्धों का स्थान हो; सुन्दर पुष्प और धान्यों से व्याप्त स्थान हो या सुन्दर, स्वादिष्ट, निर्मल जल से उत्पत्र, प्रसत्रता से युत सुन्दर दूर्वाओं से व्याप्त स्थान हो, वहाँ प्रश्न करना शुभ होता है।
जहाँ कटा-फटा, कोड़ों से खाये, काँटेदार, जले, रूखे और कुटिल वृक्ष हों तथा अशुभ पक्षियों ( काक, गूढ, बक आदि) से युक्त, बहुत पत्र और खालों से रहित वृक्ष हो, वहाँ प्रश्न करना अशुभ होता है।
श्मशान, शून्य देवगृह, चौराहा, चित्त में ग्लानि उत्पत्र करने वाला, विषम (निम्नोत्रत), सदा ऊपर रहने याला, अशुद्ध फूटे भाण्ड, कोयला, आदमी की खोपड़ी, भस्म, तुष और सूखे घास से व्याप्त स्थान में प्रश्न करना अशुभ होता है।
जहाँ पर संन्यासी, नंगे आदमी, नाई (हजाम), शत्रु, बन्धनशाला, कसाई, चाण्डाल, पूर्व, यति-ये सभी रहते हों, वहाँ प्रश्न नहीं करना चाहिये तथा शस्त्र और मद्य के विक्रयस्थान में भी प्रश्न करना अशुभ होता है।
पूर्व, उत्तर या ईशान कोण की तरफ मुंह करके प्रश्न करना शुभ और वायव्य, पश्चिम, दक्षिण, आग्नेय या नैऋत्य कोण की तरफ मुख करके प्रश्न करना अशुभ होता है; साथ ही पूर्वाद्ध समय में शुभ और रात्रि, दोनों सन्ध्याओं या अपराह्न में प्रश्न करना अशुभ होता है।
यात्रा के विधान में जो शुभाशुभ निमित्त कहे गये हैं, उन निमित्तों को सम्मुख, किसी मनुष्य से लाये हुए, प्रश्नकर्ता के हस्त में या वख में देखकर शुभाशुभ फल कहना चाहिये। जैसे सरसों, शीशा, जल और कागज देख कर शुभ तथा कपाल, औषध और काले धान्य देख कर अशुभ कहना चाहिए।
अरु, ओठ, स्तन, अण्डकोश, पाँव, दाँट, बाहु, हाथ, गाल, केश, कण्ठ, नख, अंगूठा, संख, फाँख, कन्या, कान, गुप्तेन्द्रिय, दो अंगों के सन्धि स्थान-ये सब पुरुष-संज्ञक कहे गये हैं।
भौंह, नाक, स्फिक् ( नितम्ब), त्रिवली, कमर, करमध्य की सुन्दर रेखा, अंगुली, जोभ, गर्दन, दोनों जंघाओं के पृष्ठ भाग, एड़ी, जंघा, नाभि, कर्णपाली, कुकाटी ( गर्दन का पृष्ठ-भाग) - ये सब स्त्रीसंज्ञक अंग हैं।
मुख, पृष्ठ, काँखों की सन्धि, जानु, हट्टी, बगल, हदय, तालु, नेत्र, लिङ्ग, छातो, त्रिक (कटि का पश्चिम भाग), शिर, ललाट ये सब नपुंसक अंग हैं।
आद्य (पुरुष) संजक अंगस्यर्श करते हुये प्रश्न करे तो शोघ्र सिद्धि होती है। अपर (श्रीसंज्ञक) अंग नसे देर में और नपुंसक संज्ञक अंग स्पर्श करते हुये प्रश्न करे जो कदापि सिद्धि नहीं होती है। यदि पुरुष संस्क या ती संज्ञक अंग रूखा, क्षत, भग्न या कुरा हो तो कदापि सिद्धि नहीं होती है।
यदि प्रश्नकर्ता पाँव के अंगूठे का स्पर्श करते हुये या उसको हिलाते हुये प्रश्न करे तो नेत्ररोग, अंगुली का स्पर्श करते हुये या हिलाते हुये प्रश्न करे तो कन्या को शोक और शिर पर आघात करते हुए प्रश्न करे तो राजा से भय होता है।
यदि प्रश्न करने वाला छाती को छूते हुए प्रश्न करे तो विप्रयोग (किसी स्नेही से वियोग) होता है। अपने शरीर से कोई यख उतारते हुए प्रश्न करे तो अनर्थ होता है और यख को पकड़ कर एक पाँव को दूसरे पाँव पर रखते हुए, प्रश्न करे तो प्रिय का लाभ होता है।
यदि प्रश्नकर्ता पाँव के अंगूठे से भूमि पर लिखे तो खेत की चिन्ता और दोनों हाथों से दोनों पाँवों को खुजलावे तो दासी की चिन्ता कहनी चाहिये।
यदि प्रश्न करने के समय ताड़ के वृक्ष के पत्ते, भोजपत्र या वस्त्र का दर्शन हो तो यल को चिन्ता कहनी चाहिये। केश, तुष (धान्यों की भूसी), हड्डी या भस्म पर बैठा हुआ प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो व्याधि होती है तथा प्रश्नकाल में रस्सी का जाल और वृक्ष का खाल देखने से बन्धन होता है ।
यदि प्रश्नकाल में पीपल, मिर्च, सोंठ, मुस्ता (नागरमोथा), लोध्र, कूट, यत्र, नेत्रबाला, जौरा, गन्पपांसि (बाले छड़), सॉफ और तगर के फूल का दर्शन हो तो क्रम से स्त्री के दोष, पुरुष के दोष, रोगी, सर्वनाश, अर्थनाश
पुत्रनाश, अर्थनाश, धान्यनाश, पुत्रनारा, द्विपदनाश, बतुष्पदनाश और भूमिनाश की चिन्ता कहनी चाहिए। जैसे पीपल के दर्शन से खीदोष की, मिर्च के दर्शन से पुरुषदोष की, सोंठ के दर्शन से रोगी इत्यादि की चिन्ता कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता के हाथ में बड़, महुआ, तिन्दू, जामुन, पाकड़, आम और और का फल हो तो क्रम से धन, सुवर्ण, द्विपद, लोहा, वस्त्र, चाँदी और औदुम्बर ( ताँबा ) की प्राप्ति कहनी चाहिए। जैसे बढ़ का फल हाय में हो तो धन की प्राप्ति, महुआ का फल हाथ में हो तो सुवर्ण को प्राप्ति इत्यादि कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में धान्यों से परिपूर्ण पात्र या पूर्ण घट दिखाई दे तो कुटुम्बों की वृद्धि होती है। पदि हाथी की लौद, गाय का गोबर और कुत्ते को विक्षा दिखाई दे तो इस से धन का विनाश, युवती खो का विनाश और मित्रो का विनाश कड़ना चाहिये।
यदि प्रश्नकाल में पशु, हाथी, पैस, कमल, चाँदी और बाप दिखाई दे तो क्रम से कम्बल आदि ऊनी वस्त्र, धन, रेशमी वस्त्र, चन्दन, रेशमी वख और आभूषण की प्राप्ति होती है।
यदि प्रश्नकाल में वृद्ध आवक (कापालिक) का दर्शन हो तो मित्र, चूत और धनसम्बन्धी चिन्ता तथा उत्तम संन्यासी का दर्शन हो तो वेश्या, राजा और प्रसूता खी के लिये चिन्ता कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में बौद्धमतानुयायी, उपाध्याय, अर्हत्, निर्ग्रन्यी, दैवज्ञ, निगम और घीवर दिखाई दे तो क्रम से चोर, सेनापति, बनियाँ, दासी, योद्धा, दुकानदार और वध- सम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में तापस (तपस्यो) का दर्शन हो तो प्रवासी की और कलाल ( मद्य बेचने बाले) का दर्शन हो तो पशुओं की रक्षासम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिए। यदि उन्छ वृत्ति ( गिरे हुये एक-एक दाने को इकट्ठा करने वाले) का दर्शन हो तो विपत्ति की चिन्ता कहनी चाहिए।
यदि प्रश्न करने के समय प्रश्नकर्ता के मुख से पहले-पहल 'मैं पूछना चाहता हूँ आप कहिए' इस तरह का शब्द निकले तो सन्धि या कुटुम्बसम्बन्धी, 'आप देखिये' इस तरह का शब्द निकले तो लाभसम्बन्धी और 'आप आज्ञा दें' इस तरह का शब्द निकले तो ऐश्वर्यसम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिये।
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता के मुख से पहले-पहल 'बताइये' ऐसा शब्द निकले तो जय या मार्गसम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिए। 'देख कर मेरे हृदयगत बात को चताइये' ऐसा निकले तो बन्धुकृत और 'आप शीघ्र देखिये' ऐसा शब्द निकले तो सब लोगों के मध्यगत प्रश्नकर्ता को घोरसम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता भाँठर के अंग का स्पर्श करे तो अपना मनुष्य, चाहर के अंग का स्पर्श करे तो बाहर के मनुष्य, पाँव के अंगूठे का स्पर्श करे तो दास, पाँव की अंगुली का स्पर्श करे तो दासी, जहा का स्पर्श करे तो प्रेप्य ( दूत), नाभि का स्पर्श करे तो बहन, हृदय का स्पर्श करे तो अपनी खो, हाथ के अंगूठे का स्पर्श करे तो अपना पुत्र और हाथ को अंगुली का स्पर्श करे तो अपनी कन्या को चोर कहना चाहिये।
पदिकाल में प्रकार का कोही माता, सिर का स्पर्श करे तो तुरकर पर्णको भाई और वाम भुख का सर्व करे तो भाभी को भोर
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता भीतर के अंगों को छोड़ कर बाहर के अंगों का स्पर्श करे, कफ फेंके, मूत्रोत्सर्ग या मलोलार्ग करे, अपने हाथ की वस्तु को गिरावे, अपने शरीर को झुकावे या अपने अंग को तोड़े तो चोरी गई वस्तु पुनः नहीं प्राप्त करता है
किसों के हाथ में खाली पात्र या चोर को देख कर भी चोरी गई वस्तु नहीं प्राप्त करता है। अथवा प्रश्न के समय 'हर लिया, गिर गया, कट गया, भूल गया, नष्ट हो गया, टूट गया, चोरी गया, मर गया आदि अनिष्ट शब्द उत्पन्न हों तो भी चोरो गई यस्तु' पुनः प्राप्त नहीं होती है।
नष्ट चिन्ता में प्रतिपादित पूर्वोक्त (अन्तरङ्ग इत्यादि) स्थिति यदि तुष (धान्यों की भूसी), हड्डी, विष आदि देखने के साथ अथवा रोने या छोंक के साथ हो तो रोगियों की मृत्यु होती है।
यदि भीतर के दृढ अंगों को स्पर्श करके धास निकालते हुये प्रश्न करे तो प्रश्नकर्ता अधिक अब खाकर प्रसत्र पैता है-ऐमा दैवज्ञ को कहना चाहिए ।
यदि प्रश्नकर्ता ललाट का स्पर्श करे या शूक धान्य (यव आदि) का दर्शन करे तो साठी का चावल, छाती का स्पर्श करे तो षष्टिक (साठ रात में होने वाला) धान्य एवं गर्दन का स्पर्श करे तो यव इसने खाया है-ऐसा कहना चाहिये।
यदि प्रश्न के समय कोख, स्तन, पेट और जानु का स्पर्श करे तो क्रम से प्रश्नकर्ता माष (उड़द), जल और यव खाकर आया है तथा ओठ को चबावे या चाटे तो मधुर रस खाकर आया है-ऐसा कहना चाहिए।
यदि प्रश्न के समय में सृक्क (ओष्ठप्रान्त) में जिह्वा मारे तो प्रश्नकर्ता खट्टा, मुख खुजलावे तो कहुआ, हिचकी करे तो कषैला और यूके तो नमक खाया है-ऐसा कहना चाहिये।
यदि प्रश्नकाल में कफ फेंके तोड़ी सूखी तीतो यस्तु और मांसभोजी पक्षों को सुगे या देखे तो मांसमिश्रित वस्तु तथा धू, गाल या ओठ का स्पर्श करे तो प्रश्नकर्ता ने पक्षी का मांस खाया है-ऐसा कहना चाहिये।
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता शिर, कण्ठ, ठोड़ी, केश, कनपटी, कान, जंघा और बस्ति ( नाभि और लिंग के बीच का स्थान) का स्पर्श करे तो क्रम से हाथी, भैंस, शूकर, मेष, गौ, खरगोश, मृग और भैंस के मांस से मिश्रित भोजन किया है-ऐसा कहना चाहिये।
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता अशकुन देखे या सुने तो गोह या मछली का मांस खाकर आया है-ऐसा कहना चाहिये। इसी तरह गर्भिणी के प्रश्न में गर्भस्राव को कल्पना करनी चाहिये, जैसे गर्भिणी के प्रश्नकाल में अशकुन देखे या सुने तो गर्भस्राव कहना चाहिए।
यदि गर्भिणी के प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता पुरुष, स्ली या नपुंसक को देखे, उसकी चिन्ता करे, उसको सम्मुख स्थित देखे या उनका स्पर्श करे तो क्रम से उसी का जन्म कहना चाहिये अर्थात् पुरुष के दर्शन आदि से पुरुष का, त्री से स्त्री का और नपुंसक से नपुंसक का जन्म कहना चाहिये। इस समय आसव, अन्न, पुष्प, फल का दर्शन शुभ होता है।
पदि स्त्री अपने अंगूठे से धूयुगल, पेट या अगुलियों का स्पर्श करके प्रश्न करे या प्रश्नकाल में मधु, घृत आदि (शोभन फल आदि), सुवर्ण, रत्न, मूँगा, मोती, पाई या पुत्र सम्मुख दिखाई दे तो गर्भ की चिन्ता कहनी चाहिये ।
यदि प्रश्नकाल में स्त्री पेट पर हाथ रखकर प्रश्न करे तो गर्भ कहना चाहिये। यदि उस समय अशकुन दिखाई दे, प्रश्न करने वाली पीठ को मल कर पेट को खुजलावे या हाथ देकर प्रश्न करे तो गर्भपात कहना चाहिये।
'गर्भ होगा या नहीं' इस तरह के प्रश्नकाल में खी यदि नासिका के दक्षिण द्वार (पिङ्गला नाड़ी) का स्पर्श करे तो एक मास बाद, थाम द्वार (इडा नाडी) का स्पर्श करे तो दो वर्ष में, दक्षिण कर्ण का स्पर्श करे तो दो मास बाद, वाम कर्ण का स्पर्श करे तो दो वर्ष बाद, दक्षिण स्तन का स्पर्श करे तो चार साल बाद और ग्राम स्तन का स्पर्श करे तो दो वर्ष में गर्भस्थिति होगी-ऐसा कहना चाहिये।
यदि 'मुझे कितनी सन्तान होगो' इस तरह के प्रश्नकाल में त्री केशपाश का स्पर्श करे तो तीन लड़के और दो लड़कियाँ, कान का स्पर्श करे तो पाँच लड़के, हाथ का स्पर्श करे तो तीन लड़के, कनिष्ठा अंगुलि का स्पर्श करे तो एक लड़का, अनामिका का स्पर्श करे तो दो लड़के, मध्यमा का स्पर्श करे तो तीन लड़के, तर्जनी का स्पर्श करे तो चार लड़के, अगूठे का स्पर्श करे तो पाँच लड़के और पाँव के अंगूठे का या दोनों एड़ियों का स्पर्श करे तो केवल एक कन्या कहनी चाहिये।
यदि पूर्वोक्त प्रश्नकाल में ली दक्षिण ऊरु का स्पर्श करे तो दो लड़कियाँ, वाम ऊरु का स्पर्श करे तो दो लड़कें, ललाट के मध्य का स्पर्श करे तो चार लड़कियाँ और ललाट के अन्त का स्पर्श करे तो तीन लड़कियाँ होती हैं।
'सन्तान किस नक्षत्र में उत्पत्र होगी' इस तरह के प्रश्नकाल में यदि तो शिर, ललाट, भी, कान, गाल, कनपटी, दाँत, गर्दन, दक्षिण स्कन्य, वाम स्कन्ध, दोनों हाथ, ठोड़ी, कण्ठ, छाती, दक्षिण स्तन, वाम स्तन, हृदय, दक्षिण बगल, वाम बगल, पेट, कमर, स्फिक् (कुल्ला)
गुदा की सन्धि, दक्षिण ऊरु, वाम ऊरु, जानु, जंघा और पाँव का स्पर्श करे तो क्रम से कृत्तिका आदि नक्षत्र में जन्म कहना चाहिये। जैसे शिर का स्पर्श करे तो कृत्तिका, ललाट का स्पर्श करे तो रोहिणी, भौ का स्पर्श करे तो मृगशिरा इत्यादि में जन्म कहना चाहिये ।
सब शास्त्रों को अच्छी तरह देख कर अभीष्ट-सिद्धि के लिये यह अति स्पष्ट 'अवयव-स्पर्शन-लक्षण' कहा गया है। जो अतिशय बुद्धिमान् उदार दैवज्ञ इसको पूर्ण रूप से जान लेता है, यह सदा राजा और प्रजा से पूजित होता रहता है।
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धर्म का अन्वेषण
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