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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 28
अन्तरङ्गमवमुच्य बाह्यगस्पर्शनं यदि करोति पृच्छकः । श्लेष्ममूत्रशकृतस्त्यजत्यथो पातयेत् करतलस्यवस्तु चेत् ॥
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता भीतर के अंगों को छोड़ कर बाहर के अंगों का स्पर्श करे, कफ फेंके, मूत्रोत्सर्ग या मलोलार्ग करे, अपने हाथ की वस्तु को गिरावे, अपने शरीर को झुकावे या अपने अंग को तोड़े तो चोरी गई वस्तु पुनः नहीं प्राप्त करता है
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