नपुंसकाख्यं च शिरो ललाटमाश्चाद्यसंज्ञैरपरैश्चिरेण । सिद्धिर्भवेज्जातु नपुंसकैनों रूक्षक्षतैर्भग्नकृशैश्च पूर्वेः ॥
आद्य (पुरुष) संजक अंगस्यर्श करते हुये प्रश्न करे तो शोघ्र सिद्धि होती है। अपर (श्रीसंज्ञक) अंग नसे देर में और नपुंसक संज्ञक अंग स्पर्श करते हुये प्रश्न करे जो कदापि सिद्धि नहीं होती है। यदि पुरुष संस्क या ती संज्ञक अंग रूखा, क्षत, भग्न
या कुरा हो तो कदापि सिद्धि नहीं होती है।
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