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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 45
उरः कुचं दक्षिणमप्यसव्यं हत्पार्श्वमेवं जठरं कटिश्च । स्फिक्पायुसन्च्यूरुयुगञ्च जानू जतेऽ घ पादाविति कृत्तिकादी ॥
गुदा की सन्धि, दक्षिण ऊरु, वाम ऊरु, जानु, जंघा और पाँव का स्पर्श करे तो क्रम से कृत्तिका आदि नक्षत्र में जन्म कहना चाहिये। जैसे शिर का स्पर्श करे तो कृत्तिका, ललाट का स्पर्श करे तो रोहिणी, भौ का स्पर्श करे तो मृगशिरा इत्यादि में जन्म कहना चाहिये ।
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