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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 17
स्त्रीपुरुषदोषपीडितसर्वार्थसुतार्थधान्यतनयानाम् द्विचतुष्पदक्षितीनां विनाशतः नाशतः कीर्तितैर्दृष्टैः ॥
पुत्रनाश, अर्थनाश, धान्यनाश, पुत्रनारा, द्विपदनाश, बतुष्पदनाश और भूमिनाश की चिन्ता कहनी चाहिए। जैसे पीपल के दर्शन से खीदोष की, मिर्च के दर्शन से पुरुषदोष की, सोंठ के दर्शन से रोगी इत्यादि की चिन्ता कहनी चाहिये ।
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