पुत्रनाश, अर्थनाश, धान्यनाश, पुत्रनारा, द्विपदनाश, बतुष्पदनाश और भूमिनाश की चिन्ता कहनी चाहिए। जैसे पीपल के दर्शन से खीदोष की, मिर्च के दर्शन से पुरुषदोष की, सोंठ के दर्शन से रोगी इत्यादि की चिन्ता कहनी चाहिये ।
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