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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 1
दैवज्ञेन शुभाशुभं दिगुदितस्थानाहतानीक्षता वाच्यं प्रष्टनिजापराङ्गघटनां चालोक्य कालं चिया। सर्वज्ञो हि चराचरात्मकतयाऽसौ सर्वदर्शी विभु- श्चेष्टाव्याहतिभिः शुभाशुभफलं सन्दर्शयत्यर्थिनाम् ॥
प्रश्नकर्ता की दिशा, उसकी वाणी, उसका स्थान और उससे लाई हुई वस्तु को देखते हुये, प्रश्नकर्ता के अपने और वहाँ पर स्थित दूसरे के अंग को घटना देखकर तथा समय को अपनी बुद्धि से विचार कर दैवज्ञ को शुभाशुभ फल कहना चाहिये; क्योंकि वह काल चराचर सब प्राणियों का आत्मस्वरूप होने के कारण विभु और सबको देखने बाला होता है। वही चेष्टा और चचनों के द्वारा प्रश्नकर्ता को शुभाशुभ फल दिखाता है।
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