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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 39
अनुष्ठेन भूदरं वाङ्गुलिं वा स्पृष्ट्वा पृच्छेद्रर्भचिन्ता तदा स्यात् । मध्वाज्याद्यैर्हेमरत्नप्रवालैरप्रस्थैव मातृधात्र्यात्मजैश्च ॥
पदि स्त्री अपने अंगूठे से धूयुगल, पेट या अगुलियों का स्पर्श करके प्रश्न करे या प्रश्नकाल में मधु, घृत आदि (शोभन फल आदि), सुवर्ण, रत्न, मूँगा, मोती, पाई या पुत्र सम्मुख दिखाई दे तो गर्भ की चिन्ता कहनी चाहिये ।
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