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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 23
तापसे शौण्डिके दृष्टे प्रोषितं पशुपालनम्। हद्रतं प्रच्छकस्य स्यादुञ्छवृत्तौ विपन्नता ॥
यदि प्रश्नकाल में तापस (तपस्यो) का दर्शन हो तो प्रवासी की और कलाल ( मद्य बेचने बाले) का दर्शन हो तो पशुओं की रक्षासम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिए। यदि उन्छ वृत्ति ( गिरे हुये एक-एक दाने को इकट्ठा करने वाले) का दर्शन हो तो विपत्ति की चिन्ता कहनी चाहिए।
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