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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 26
अन्तःस्थेऽमें स्वजन उदितो बाह्याने बाह्य एव पादाङ्गष्ठावलिकलनया दासदासीजनः स्यात् । जड्हें प्रेष्यों भवति भगिनी नाभितो हत्स्वभार्या पाण्यङ्गुष्ठाङ्गुलिचयकृतस्यशनि पुत्रकन्ये ॥
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता भाँठर के अंग का स्पर्श करे तो अपना मनुष्य, चाहर के अंग का स्पर्श करे तो बाहर के मनुष्य, पाँव के अंगूठे का स्पर्श करे तो दास, पाँव की अंगुली का स्पर्श करे तो दासी, जहा का स्पर्श करे तो प्रेप्य ( दूत), नाभि का स्पर्श करे तो बहन, हृदय का स्पर्श करे तो अपनी खो, हाथ के अंगूठे का स्पर्श करे तो अपना पुत्र और हाथ को अंगुली का स्पर्श करे तो अपनी कन्या को चोर कहना चाहिये।
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