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बृहत्संहिता • अध्याय 51 • श्लोक 2
स्थानं पुष्पसुहासिभूरिफलभृत्सुस्निग्धकृत्तिच्छदा- सत्पक्षिच्युतशस्तसञ्ज्ञिततरुच्छायोपगूढं समम् । देवर्षिद्विजसाघुसिद्धनिलयं सत्पुष्पसस्योक्षितं सत्स्वादूदकनिर्मलत्वजनिताह्लादं च सच्छाद्वलम् ॥
जहाँ पुष्परूप सुन्दर मुसुकानयुत, बहुत से फलों से भरा हुआ, निर्मल छाल और पत्ते वाले, अशुभ पक्षियों से रहित और प्रशस्त संज्ञा वाले वृक्ष की छाया से आच्छादित तथा सम (बराबर) भूमि हो; देवता, ऋषि, ब्राह्मण, साधु या सिद्धों का स्थान हो; सुन्दर पुष्प और धान्यों से व्याप्त स्थान हो या सुन्दर, स्वादिष्ट, निर्मल जल से उत्पत्र, प्रसत्रता से युत सुन्दर दूर्वाओं से व्याप्त स्थान हो, वहाँ प्रश्न करना शुभ होता है।
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