Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 29 — नवविंशतितम अध्याय
शिवभारतम्
61 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात् सूर्यदेव के दिन के मध्याह्न को प्राप्त हो जाने पर शिवाजी के तेज के साथ मिलकर पीड़ा देने लगा, वन में पूर्व में न देखे गये शत्रु के द्वारा रक्षित, वायु से रहित, ऐसे उस महावन में सम्पूर्ण सेना के दुःखी होकर धैर्य के त्यागने को देखकर मदमस्त रायबागीण कारतलब को बोली।
राजव्याघ्री बोली - शिवाजी रूपी सिंह के आश्रय से युक्त वन में सेना के साथ जो प्रवेश किया है, यह तूने निन्दित कार्य किया।
अहो! तुझ घमण्डी ने दिल्लीपति की सेना को यहां लाकर सिंह मुख में अर्पित कर दिया है।
आज तक दिल्लीपति ने जितना यश प्राप्त किया था, वह उसका सारा यश तूने इस अरण्य में डुबो दिया।
देखो! आगे, पीछे, दाई ओर एवं बाई ओर खड़े हुए शत्रु आनन्द के साथ युद्ध करने के इच्छुक हैं।
ये तीरंदाजी में निपुण तेरे सभी सैनिक यहां चित्र में स्थित मनुष्य की तरह स्तब्ध हैं।
अहो! दुःखपूर्वक दिल्लीपति के उस मूर्ख सेनापति शाएस्तेखान ने शत्रु के प्रतापरूपी अग्नि में तुझे सेना के साथ भेजा।
शत्रु तुझे शीघ्र जीवित पकड़कर ले जाना चाहते हैं। तू अरण्य में कैद होने पर भी अंधे व्यक्ति की तरह युद्ध करना चाहता है।
फलसिद्धि हो रही है तो ही पुरुष के पुरुषार्थ का उपयोग है, नहीं तो साहस कार्य वास्तव में उपहास का ही कारण है।
अतः तू आज तत्काल उस राजा शिवाजी की शरण में जाकर अपने को सेनासहित मृत्युजाल से बचा ले।
इस प्रकार रायबगीन ने उस महावीर एवं साहसी यवन को वहां प्रेरित किया तो उसने युद्ध रोक दिया।
तत्पश्चात् उसने विनम्रतापूर्वक अन्यों के अभिप्राय को समझने में निपुण दूत को शिवाजी के पास भेजा।
तत्पश्चात् भालधारी लोगों द्वारा वहां पगड़ी देने पर उसने मस्तक झुकाकर आजानुबाहु शिवाजी के दूर से दर्शन किये। वह अतिसुन्दर एवं उन्नत गर्दनवाला, विस्तृत वक्षःस्थल से युक्त, सुशिक्षित, शुभलक्षणों से युक्त, महाकाय, महान् बलवान्, दोनों ओर बाणों से युक्त पंख की तरह दो तरकस वाला, रत्नजड़ित आभूषण धारण किया हुआ घोड़े पर या गरुड़ पर जैसे विष्णु बैठता है, वैसे ही आरुढ़ होकर शरीर में कवच धारण किया हुआ एवं हाथ में धनुष-बाण और तलवार से युक्त पुड़सवारों के समुदाय के मध्य में था, उसके शरीर में अभेद्य कवच था, उसके मस्तक पर उत्कृष्ट मुकुट था, वैकक्ष की माला की तरह एवं प्रचण्ड ढाल से सुशोभित दुपट्टा धारण किया हुआ था। स्वर्णयुक्त कमरपट्टे से अटकने वाली तलवार से वह सुशोभित था, उसके तेजस्वी दाएं हाथ में ऊंचा भाला था, अत्यन्त सौम्य होते हुए भी अपने तेज से वह अत्यन्त उग्र दिख रहा था, आगे जाकर लोगों को दूर हटाने वाले भालाधारियों द्वारा योग्य स्थान पर खड़े किये अनेक सैनिक उसका उत्तम सम्मान कर रहे थे, उग्र लोगों में अत्यन्त उग्र, अग्नि से भी अत्यन्त असहनीय, नैर्ऋत की अपेक्षा अत्यन्त निर्दयी, वायु से भी बलवान्, कुबेर से भी अधिक धनवान्, वरुण से भी अधिक नीतिज्ञ यमराज से भी अधिक क्रूर, इन्द्र से भी अधिक सामर्थ्यवान्, चन्द्रमा से भी अधिक आह्लादकारी और कामदेव से भी अधिक वह दुर्जेय था।
मस्तक झुकाकर आये हुए उस मुगल दूत की ओर राजा ने भी कमल की तरह सुन्दर नेत्रों से देखा।
तत्पश्चात् शिवाजी द्वारा कुछ भौओं को चढ़ाकर उसको आज्ञा देने पर उसने जिसका संदेश लाया था उसके संदेश को स्वयं बोला।
दूत बोला - जिस कारतलब नाम के सेनापति को लोग मानो दूसरा दुर्जेय रावण समझते है, वह आपसे इस प्रकार निवेदन करता है।
शाएस्तेखान के आदेश से एवं समय के योग से इस आपके देश को हमने देख लिया।
नाग द्वारा दीर्घकाल तक स्वयं धारण किये गए मणि के समान यह आपके द्वारा रक्षित देश दूसरे के अधीन नहीं हो पायेगा।
क्या बताऊं! दो-तीन दिन तक मुझे यहाँ पानी भी नहीं मिला, अतः अभयदान देकर मुझे जीवनदान दें।
सह्याद्री के पाताल के समान गहरे तल को प्राप्त करके हमारा मन दीर्घकाल तक स्तब्ध रहे एवं पराक्रम भी विस्मृत हो गया है।
यह आपका सह्याद्री का अरण्य तुंगारण्य की अपेक्षा घना है। महासागर के समान इस अरण्य में आप हमारी रक्षा करें।
आपके पिता, महामति, महाराज शहाजी राजे उनका मैं यवन होते हुए भी मेरे पर अपार स्नेह था।
वह सब कुछ विस्मृत करके दूसरे के सेवाभाव से मैंने अग्नि के समान आपकी आज्ञा का जानबूझकर उल्लंघन किया।
अतः हे महाबाहु! मैं अपना सर्वस्व आपको अर्पण करके अपने अपराध का प्रक्षालन करना चाहता हूँ और जीवित जाना चाहता हूँ।
अतः हे राजा! इस प्रदेश से बाहर जाने की आप मुझे आज्ञा दीजिए। इस संसार में शरणागत की रक्षा करने वाले आप जैसे आप ही है।
इस प्रकार यथोचित दूत के बोलकर रूक जाने पर शिवाजी महाराज अपने सैनिकों की ओर देखकर उससे इस प्रकार बोले।
शिवाजी बोलें - यदि तू शरण आया है तो इस प्रदेश से अपनी सेना के साथ निकल जा, हमारा तुझे अभय है।
इस मेरे वचन को तू यहाँ से शीघ्रता से जाकर मेरे से भयभीत दया की याचना करने वाले उस यवन को बता दे।
इस प्रकार शिवाजी द्वारा कथित मधुर वचनो को सुनकर दूत की प्रतीक्षा करने वाले उस स्वामी को संदेश सुना दिया।
वह दूत जब शिवाजी से अभय वचन लाता है तब कारतलब उसको कर भिजवाता है।
मित्रसेनादि राजा युद्ध में व्यग्र होने पर भी उनके अभय के संदेश के प्राप्त हो जाने पर उन्होंने अपना-अपना कर शीघ्र शिवाजी के पास भिजवा दिया।
युद्ध करने वाले उन यवन सैनिकों के अभयदान आने तक शिवाजी की सेना ने उनको लुट लिया एवं चारों ओर से घेर लिया।
कोई उस समय अपनी ढाल दूसरे को देकर मुक्त हो गया तो कोई घोड़े से शीघ्र उतरकर भयमुक्त हो गया।
रक्त से रंजित वस्त्रों को धारण करने वाले कुछ वीरों ने तत्काल शस्त्रों को परित्याग करके मानो संन्यास ले लिया हो।
किसी ने कर्णाभूषणों के लालच से कान छिन्न करवा लिए तो किसी ने शीघ्र मोतियों एवं रत्नों से जड़ित कण्ठाभूषण त्याग दिए।
हम शिवाजी राजा के पक्ष के है, ऐसा बोलकर कुछ घुड़सवारों ने अपने को मुक्त किया।
किसी का मस्तक तलवार से कट जाने पर अपने मारने वाले पर शीघ्र आक्रमण करके उसका मस्तक तत्काल चक्र से अलग कर दिया और अपना सहचर बना लिया।
इसी बीच हाथ ऊपर करके क्रोधी व्यक्ति के समान उच्चस्वर से चिल्लाने वाले भालधारी शिवाजी की आज्ञा से अरण्य के विभिन्न सेनापतियों के पास जाकर शत्रुओं से युद्ध करना बंद करो इस प्रकार बताया।
फिर अभय को प्राप्त हुए वे मुगल सैनिक शत्रु द्वारा रक्षित उस वन से भयभीत की तरह तुरन्त निकल गये।
फिर मुगल जैसे आये उसी प्रकार चले गये, अपने सैनिक गर्जना करने लगे, ढोल बजाने लगे, अनेक भालधारी आगे नृत्य करते हुए चलने लगे, प्रचंड जयघोषों से आकाश प्रतिध्वनित हो गया, सुंदर वस्त्रों एवं सुंदर अलंकारों को धारण करने वाले श्रेष्ठ भाट यशोगाथा गाने लगे, मुगलों द्वारा इधर फेंकी हुई एवं अंदर अपार कोष से युक्त पेटियों को लोग शीघ्र लाने लगे, पलायन करने वाले शत्रुओं द्वारा अरण्य के मध्यभाग में छोड़े हुए हाथी एवं घोड़े सैनिक लेकर आ गये, पलायन किये हुए शत्रुओं द्वारा भार के भय से परित्यक्त अनेक हंडिया, ग्लास, श्रृंगार एवं सोने के अन्य अनेक पात्रों का पर्वत अपने सैनिकों ने सर्वत्र बना दिया, ऐसे समय में अपने प्रचण्ड भुजाओं से शत्रुसमूह को दण्डित करने वाले सेनापति नेताजी को देखकर शिवाजी बोलने लगे।
शिवाजी बोले - आदिलशाह के अधीन राष्ट्र पर आक्रमण करने के लिए मैं जाता हूँ किन्तु तू मुगलों का विनाश करने के लिए तुम इसी स्थान पर रहो।
युद्ध में कभी भी पीठ न दिखाने वाले शत्रु वापस चले गये हैं, ऐसा मत समझो क्योंकि मुगल अभिमानी होते हैं।
पन्हाळगड़ का शीघ्र प्रतिशोध लेने का इच्छुक जो मैं उस प्रयत्न के तत्काल सफल हुए बिना स्थिर नहीं रहूँगा।
इस प्रकार वहाँ उस नीतिज्ञ एवं विजयी शिवाजी ने सेनापति के साथ मन्त्रणा करके विजययात्रा की दुंदुभी बजाने की आज्ञा दी।
तत्पश्चात् प्रातः उत्तम घोड़े पर आरुढ़ होकर शिवाजी राजा ने सेना समुदाय के द्वारा सुशोभित उस मार्ग को अत्यधिक अलंकृत किया।
क्रमपूर्वक आगे जाते समय नगरों, गांवों, किलों एवं अरण्यों को शत्रुओं द्वारा परित्यक्त हुआ देखकर वह अत्यन्त संतुष्ट हो गया।
तत्पश्चात् दाभोकास जाकर दाल्भ्येश्वर को नमन करके पहले उसी प्रान्त को शिवाजी राजा ने शीघ्र अपने अधीन कर लिया।
तब शिवाजी द्वारा अधीन किया गया वह प्रान्त यवनों के सम्पर्क से उत्पन्न भय से मुक्त हो गया।
तब पाली को, राजा महाबाहु जसवंत स्वयं पहले की गई सिद्दी जोहर की सहायता को स्मरण करके दुष्टों के यमराज शिवाजी को समीप आया हुआ देखकर भयभीत होकर तुरन्त उसने श्रृंगारपुर के राजा का आश्रय ले लिया।
प्रभावली के उस प्रतापी राजा सूर्यराज की, उसके अपराधी होने के कारण से भयभीत जसवंत राजा ने अपने समान शिवाजी से रक्षण किया।
किन्तु सुर्यराजा एवं जसवंत राजा का वह कार्य शिवाजी को अनुचित नहीं लगा, क्योंकि वे दोनों ही पराधीन थे।
तत्पश्चात् दाभोळ में योग्य अधिकारी को नियुक्त करके एवं युद्ध के लिए सज्ज ऐसे दो हजार वीरों को रखकर आगे बढ़ रहा था तो अभय मांगने वाले को अभयदान से संतुष्ट करके शिवाजी राजा तीन-चार दिन बाद चिपळुण चला गया।
वहाँ उसने वरदाता, विश्वविख्यात, चिरंजीवी और वर्णनीय चरित्र से युक्त परशुराम का दर्शन किया।
तत्पश्चात् जिसके दोनों ओर काल एवं काम ये दोनों भाई है, ऐसे परशुराम की उस अत्यन्त भक्तिमान् शिवाजी ने पूजा की।
उस परशुराम ने भी अविंध के राजा की शक्ति को नष्ट करने वाले उस राजा पर बड़ी कृपा की।
उस दान निपुण एवं दयालु शिवाजी ने उस परशुराम क्षेत्र के ब्राह्मण श्रेष्ठ को तत्काल धन देकर संतुष्ट किया।
तत्पश्चात् मुगल अधिकारियों द्वारा तत्क्षण छोड़े गये संगमेश्वर के संबंध से संगमेश्वर नाम वाले एवं अत्यधिक ब्राह्मणों एवं देवताओं से युक्त नगर के अपने अधीन हो जाने से वे राजर्षि देवरुखास देवर्षिस्थान की ओर गये।
तब उसकी आज्ञा से ब्राह्मण नीलकंठ राजा का पुत्र, विभिन्न युद्धों द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ, पदाति सेना का अधिपति उच्चकुल वंशी, योद्धा, तानाजी मालुसरे इनके साथ शत्रु के आक्रमण के कारण से विचलित होकर संगमेश्वर आ गया।
श्रृंगारपुर में रहने वाला तू इस देश के रक्षणार्थ संगमेश्वर में रहने वाली मेरी सेना पर मेरे आने तक अच्छी प्रकार से नियन्त्रण रख शत्रुता त्याग दें एवं मेरे द्वारा बताएं गए कर्तव्यों का पालन कर ऐसा संदेश विश्वासयुक्त दूत द्वारा प्रभावली के राजा को उस राजा ने उस समय भेज दिया।
तत्पश्चात् पुन्न एवं बकुल के फूलों से सुगंधित, नागलता, नारकी एवं केरेलु के पने वृक्षों से युक्त, अनेक देवताओं से युक्त, जहाँ बस्तियां ब्राह्मण परिवारों से युक्त है, उद्यानमय पर्वतों से युक्त, प्रायः तीर्थमय नदी एवं नदों से युक्त ऐसे उस प्रदेश को शीघ्र अपने अधीन करके एवं राजापुर को जीतकर वह श्रेष्ठ राजा सुशोभित होने लगा।
अपने बाहुबल से यवन सेना का विनाश करके तथा उनके प्रान्तों को अधीन करके एवं शरणागतों को अभयदान देकर वह इन्द्र की तरह, दयालु, राजाधिराज शिवाजी समुद्र पर आश्रित व्यापारियों को समुद्र ने धनवान् बनवाया ऐसे राजपुर में वह विराजमान हो गया।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें