यथायथं गदित्वेत्थं दूते विरतिमीयुषि। नृपः स्वसैनिकान् वीक्ष्य स तं प्रत्यब्रवीदिदम्।।
इस प्रकार यथोचित दूत के बोलकर रूक जाने पर शिवाजी महाराज अपने सैनिकों की ओर देखकर उससे इस प्रकार बोले।
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