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शिवभारतम् • अध्याय 29 • श्लोक 13
ततोऽतिसुन्दरोदग्रग्रीवे व्यायतवक्षसि । शिक्षिते लक्षणोपेते महाकाये महौजसि ।। पार्श्वद्वितयसंसक्तनिषंगद्वयपक्षतौ। सरत्नाभरणे सप्तौ ताक्ष्यै हरिमिव स्थितम्।। आमुक्तवारबाणानां धन्वबाणासिधारिणाम्। बहूनां वाहवाराणां व्यूहाभ्यंतरवर्तिनम् ।। पिनद्धाभेद्यवर्माणां वर्ण्यशीर्षण्यशालिनम्। भव्यसव्येतरस्कंधविषक्तविशिखासनम् ।। वैकक्षिकीकृतोद्दामफलकोद्योतितांबरम्। स्वर्गसारसनालंविकौक्षेयककृतश्रियम् ।। दीव्यद्दक्षिणपाण्यग्रसंसक्तोन्नतशक्तिकम्। अतिसौम्यमपि स्वेन प्रभावेणातिभीषणम्।। पुरः प्रोत्सारणपरैर्हेमवेत्रधरैनरैः । यथास्थानीकृतानेकसैनिकैः साधुसेवितम् ।। उग्रमुग्रादपि भृशं दुर्धरं दहनादपि। निर्घणं नैर्ऋताच्चोच्चैर्बलिनं मारुतादपि।। वित्तेशादपि वित्ताद्यं प्रभुं वज्रधरादपि। दण्डहस्तादपि क्रूरं नीतिज्ञं वरुणादपि ।। चन्द्रादपि कृताह्लादं दुर्जयं मन्मथादपि। नरैर्वेत्रधरैस्तत्र नमन्मौलिर्निवेदितः ।। स तं राजानमाजानुभुजं दूरादलोकत ।।
तत्पश्चात् भालधारी लोगों द्वारा वहां पगड़ी देने पर उसने मस्तक झुकाकर आजानुबाहु शिवाजी के दूर से दर्शन किये। वह अतिसुन्दर एवं उन्नत गर्दनवाला, विस्तृत वक्षःस्थल से युक्त, सुशिक्षित, शुभलक्षणों से युक्त, महाकाय, महान् बलवान्, दोनों ओर बाणों से युक्त पंख की तरह दो तरकस वाला, रत्नजड़ित आभूषण धारण किया हुआ घोड़े पर या गरुड़ पर जैसे विष्णु बैठता है, वैसे ही आरुढ़ होकर शरीर में कवच धारण किया हुआ एवं हाथ में धनुष-बाण और तलवार से युक्त पुड़सवारों के समुदाय के मध्य में था, उसके शरीर में अभेद्य कवच था, उसके मस्तक पर उत्कृष्ट मुकुट था, वैकक्ष की माला की तरह एवं प्रचण्ड ढाल से सुशोभित दुपट्टा धारण किया हुआ था। स्वर्णयुक्त कमरपट्टे से अटकने वाली तलवार से वह सुशोभित था, उसके तेजस्वी दाएं हाथ में ऊंचा भाला था, अत्यन्त सौम्य होते हुए भी अपने तेज से वह अत्यन्त उग्र दिख रहा था, आगे जाकर लोगों को दूर हटाने वाले भालाधारियों द्वारा योग्य स्थान पर खड़े किये अनेक सैनिक उसका उत्तम सम्मान कर रहे थे, उग्र लोगों में अत्यन्त उग्र, अग्नि से भी अत्यन्त असहनीय, नैर्ऋत की अपेक्षा अत्यन्त निर्दयी, वायु से भी बलवान्, कुबेर से भी अधिक धनवान्, वरुण से भी अधिक नीतिज्ञ यमराज से भी अधिक क्रूर, इन्द्र से भी अधिक सामर्थ्यवान्, चन्द्रमा से भी अधिक आह्लादकारी और कामदेव से भी अधिक वह दुर्जेय था।
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