अमुं विनम्रमूर्धानं ताम्रदूतमुपागतम्। सरोरुहसदृग्भ्यां स दृग्भ्यां देवोऽप्युदेक्षत ।।
मस्तक झुकाकर आये हुए उस मुगल दूत की ओर राजा ने भी कमल की तरह सुन्दर नेत्रों से देखा।
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