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शिवभारतम् • अध्याय 29 • श्लोक 33
परस्मै फलकं दत्वा कश्चिन्मुक्तोऽभवत् तदा। अवरुह्य हयात् तूर्णं भयात् कश्चिदमुच्यत ।।
कोई उस समय अपनी ढाल दूसरे को देकर मुक्त हो गया तो कोई घोड़े से शीघ्र उतरकर भयमुक्त हो गया।
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