इति संमन्त्र्य सेनान्या समं तत्र स मन्त्रवित्। अकारयज्जयी जैत्रप्रयाणपटहस्वनम् ।।
इस प्रकार वहाँ उस नीतिज्ञ एवं विजयी शिवाजी ने सेनापति के साथ मन्त्रणा करके विजययात्रा की दुंदुभी बजाने की आज्ञा दी।
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