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शिवभारतम् • अध्याय 29 • श्लोक 1
कवीन्द्र उवाच - अथ द्युतिपती देवे दिवो मध्यमुपागते। समेत्य शिवतेजोभिः सन्तापयितुमुद्यते ।। अवीक्षितवने तस्मिन् विपक्षविहितावने। बल अलभ्यमानपवने दूयमानं महावने।। विलोक्यानीकमखिलं विषीदंतमनेकधा। जगाद कारतलबं राजव्याघ्री मदोद्धता ।।
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात् सूर्यदेव के दिन के मध्याह्न को प्राप्त हो जाने पर शिवाजी के तेज के साथ मिलकर पीड़ा देने लगा, वन में पूर्व में न देखे गये शत्रु के द्वारा रक्षित, वायु से रहित, ऐसे उस महावन में सम्पूर्ण सेना के दुःखी होकर धैर्य के त्यागने को देखकर मदमस्त रायबागीण कारतलब को बोली।
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