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शिवभारतम् • अध्याय 29 • श्लोक 40
अथाशु ताम्रवक्त्रेषु प्रयातेषु यथागतम्। गर्जत्सु निजसैन्येषु तूर्येषु निददत्सु च।। पुरःसरेष्वनेकेषु विनटद्वेत्रपाणिषु। जयघोषविशेषेण पूरयत्सु च पुष्करम्।। भव्यांबरेषु भव्येषु भव्याभरणधारिषु। उच्चैस्तरां यशोगाथाश्चारणेषु पठत्सु च ।। अपारकोषगर्भासु मंजूषासु निजैनरैः। क्षिप्रमाहियमाणासु ताम्रक्षिप्तास्वितस्ततः ।। विमुक्तेष्वब्वीगर्भे रिपुभिः प्रपलायिभिः। सैन्येरानीयमानेषु गजेषु तुरंगेषु च।। भारभीत्यावमुक्तानामपयातैररातिभिः। स्थालानां चषकाणां च भंगाराणां च भूरिशः ।। अन्येषां चाप्यमत्राणां सौवर्णानामनेकशः। स्वभृत्यैः क्रियमाणेषु पर्वतेषु च सर्वतः ।। चण्डेन भुजदण्डेन दण्डितारातिमण्डलः । शिवः समीक्ष्य नेतारं सेनापतिमवोचत ।।
फिर मुगल जैसे आये उसी प्रकार चले गये, अपने सैनिक गर्जना करने लगे, ढोल बजाने लगे, अनेक भालधारी आगे नृत्य करते हुए चलने लगे, प्रचंड जयघोषों से आकाश प्रतिध्वनित हो गया, सुंदर वस्त्रों एवं सुंदर अलंकारों को धारण करने वाले श्रेष्ठ भाट यशोगाथा गाने लगे, मुगलों द्वारा इधर फेंकी हुई एवं अंदर अपार कोष से युक्त पेटियों को लोग शीघ्र लाने लगे, पलायन करने वाले शत्रुओं द्वारा अरण्य के मध्यभाग में छोड़े हुए हाथी एवं घोड़े सैनिक लेकर आ गये, पलायन किये हुए शत्रुओं द्वारा भार के भय से परित्यक्त अनेक हंडिया, ग्लास, श्रृंगार एवं सोने के अन्य अनेक पात्रों का पर्वत अपने सैनिकों ने सर्वत्र बना दिया, ऐसे समय में अपने प्रचण्ड भुजाओं से शत्रुसमूह को दण्डित करने वाले सेनापति नेताजी को देखकर शिवाजी बोलने लगे।
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