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अध्याय 12 — द्वादश अध्याय

शिवभारतम्
58 श्लोक • केवल अनुवाद
चक्रवाक, पक्षी के वियोग से उत्पन्न दुःख को हरन करनेवाला, कांतिमान सूर्य के उदयांचल शिखर के अग्रभाग पर आरूढ होने के लिए आतुर होने पर, प्रभात के संध्याराग से गगनरुपी आंगन में लालिमा के आने पर, अंधकाररुपी निशाचर से सभी दिशाओं के मुक्त होने पर, मानो भय से आंदोलित पंपासरोवर के जलकणों के संपर्क से शीतल एवं विकसित कमलों की सुगंधि से आह्लाददायी वायु बह रही थी। ऐसे समय पर दिलावरखान, मसूदखान, सरजाखान याकुखान, अंबरखान, अदवनी का राजा, कर्णपूर का राजा फरादखान एवं कैरातखान ये दोनो, उसी प्रकार याकुतसार, आजमखान एवं बहुलोल अभिमानी मलिक शहनखान, राघव मंबाजी, वेदोजी भास्कर, और हैवत राजा का पुत्र महाबलशाली बल्लाल, इस प्रकार तीनों मदोन्मत्त ब्राह्मण सेनापति सिधोजी एवं मंबाजी पवार, मंबाजी भोसले और भिन्न-भिन्न कुलों के दूसरे सेनापतियों के शरीर में युद्ध का जोश व्याप्त होने से बडे बडे शखों को धारण करके अपने ध्वजों के समूहों से आकाश को कंपाते हुए, घोडों के खुरों के अग्रभाग से मानों पृथ्वी को चूर्ण करते हुए, अपने तेजोमय कांति से संपूर्ण त्रिभुवन को मानो जलाते हुए, प्रबल सैन्यबल से मानों चारों ओर अभेद्य दीवार बनाते हुए, अग्नि के समान तेजस्वी एवं यमराज के समान निर्भय ऐसे इन सेनापतियों ने मुस्तुफाखान की आज्ञा से शहाजी राजा के शिबिर को चारों ओर से घेर लिया।
इधर शहाजी के शिबिर में हाथी पर जीन चढ़ाए नहीं थे, घोड़े को काठी नहीं पहनाई थी, सैनिकों के वल सज्ज नहीं थे, सेनापति अभी अभी सो कर उठे थे, रात्रि के जागरण से चौकीदार अतिशय तन्द्रा में थे, इस कारण अनेक प्रकार से भयभीत होकर अचानक उस शिबिर में भगदड़ मच गई।
बडे परिधि से जैसे सूर्य का बिंब दिखता नही हैं, उस प्रकार ही शत्रु की सेना से शहाजी का शिबिर उस समय प्रतीत होने लगा।
समुद्र के समान गर्जन करती हुई उस सेना के पृष्ठभाग का संपूर्ण संरक्षण सेनापति मुस्तुफाखान स्वयं कर रहा था।
तत्पश्चात् खंडोजी, अंबाजी, मनाजी ये मित्र तथा अन्य सैनिकों सहित, ओर तलवारों, धनुषों, भालों, बंदुकों एवं चाको को धारण करने वाले पुरुषों से घिरा हुआ वह घोरकर्मा महाबाहु बाजराज घोरपडे, मानो दूसरा वडवानल ही हो ऐसा यशवंतराव वाढवे, पवार कुल के दीपक मालोजी राजा, विख्यात तुकोजी राजा, राजा भोसले ऐसे ये सभी बलिष्ठ सेनापति अपने बैठे हुए घोडो के सुरों से पृथ्वी को चूर्ण करते हुए शहाजी के शिबिर में प्रविष्ट हुये।
हाथी सिंह को जैसे जागृत करता है, वैसे ही उस समय उन मदमस्त जीतने के इच्छुक एवं अतिशय गर्जना करने वाले सेनापतियों ने सोये हुए शहाजी को जगाया।
शत्रुओं के आगमन को सुनते ही जागृत होकर स्वयं सज्ज होते हुए शहाजी ने 'तैयार हो जाओ' ऐसा सभी सैनिकों को जोर से आदेश दिया।
तब 'घोडा घोडा, तलवार तलवार, भाला भाला,' इस प्रकार शहाजी के शिबिर में अचानक आवाज गुंजने लगी।
महाबाहु एवं महाबलशाली शहाजी राजा तैयार हो रहा है, एवं उसकी बडी सेना आकस्मिक भय से प्रसित हो गई। इतने में ही प्रत्येक युद्ध में सिंह के समान अकुण्ठितगति वाला खंडोजी पाटील अकेला ही घोरपडे पर आक्रमण करने के लिए गया।
शरीर पर कवच धारण किया हुआ, दृढ ढाल के कारण अभेद्य, भाला धारण करने वाला, उत्तम धनुर्धर, तलवार से युक्त, युद्धकुशल ऐसा प्रख्यात खंडोजी जब शीघ्र घोडे पर बैठकर रणभूमि पर गया तब बाजी घोरपडे आदि ने सिंह जैसी गर्जना की।
फिर अत्यन्त वेगवान घोरपडे सेनापतियों ने उस कुल आभूषण पाटील को क्रोध से दोनों ओर से घेर लिया।
तब उस तेजस्वी खंडोजी पाटील ने मेघों से स्पर्श करने वाले अपने भाले घूमाकर अपने घोडे से हजारों गोलाकार निकलवायें।
उसके द्वारा गोल घुमाये हुए भालें, अंतरिक्ष में गोल घूमने वाले तेजोवलय सूर्य के बिंब के समान चमकने लगा।
अनेक प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने वाले, बड़े-बड़े आयुधों को धारण करने वाले वीरों के, क्रोध से उस भालाधारी ने तुकडे तुकडे कर दिए।
क्रोधित इंद्र ने अपने वज्र से गिराये हुए पर्वत के समान, प्रत्येक योद्धाओं के अवयव तुटकर भूमि पर गिरने लगे।
आक्रमण करने वाले शत्रुसमुहों के सैकडों शस्त्रों के प्रहार से उसका कवच छिन्न भिन्न हो गया था, ऐसे उस पाटील ने शत्रुरुपी हाथियों को वापिस लौटा दिया था।
शत्रुओं के द्वारा छोडे गए बाणों से जिसका शरीर क्षत विक्षत हो गया है, ऐसा खून से सना हुआ वह मंगलग्रह के समान सुशोभित होने लगा।
युद्ध करने वाले उस पाटील के आश्चर्यकारी कुशलता को देखकर बाजराज घोरपडे आदि सैनिक गर्जना करने लगे एवं भुजाओं को बजाने लगे।
युद्ध में शत्रुओं के अभिमान का हरण करने वाले मानाजी ने अपने भाले से उसके भाले को तोड देने पर उसने एक तीक्ष्ण तलवार हाथ में ले ली।
तब युद्ध निपुण उस तलवारधारी खंडोजी को देखकर महाबलवान बाजराज ने मुस्कुराकर युद्ध के लिए आह्वान किया।
तब खंडोजी पाटील ने यमराज के दंड के समान भयंकर तलवार से बाजराज घोरपडे की छाती पर प्रहार किया।
विशाल छाती पर किए गए उस जोर के प्रहार से महाबाहु बाजराज घोरपडे के मूर्च्छित होने पर अंबाजी ने भयंकर लोहबद्ध दंडा, मानाजी ने मुगर, मालोजी ने अग्नि के लपेटों जैसी कालीशक्ति, बालाजी ने अप्रतिम भाला, जसवंत ने बाण और खंडोजी ने तलवार ऐसे ये शस्त्र खंडोजी पाटील के शरीर पर फेंक दिये।
चारों तरफ से योद्धाओं के द्वारा फेंके गए सभी शस्त्र जब शरीर पर आकर गिरने लगे तो उनमें से अपने भयंकर तलवार से किसी के दो तुकडे, किसी के तीन-तीन तुकडे, किसी के पांच उसी प्रकार किसी के नौ, किसी के दस तुकडे किये।
बाजराज ने क्षणमात्र मूर्छा का एवं क्षणभर अत्यंत विलक्षण स्थिति का स्वयं अनुभव करके वह पाटील के साथ युद्ध करने लगा।
जिसकी आकृति शत्रुओं के लिए भयानक थी, ऐसे प्रचंड गदा से बाजराज ने अपनी प्रतिभा से पाटिल की जंघा पर प्रहार किया।
कार्तिकय की तीक्ष्ण शक्ति क्रौंच पर्वत पर जैसे गिर जाती है, वैसे ही बाजराज की गदा से भिन्न होकर गिर जाने पर, उस उत्कृष्ट खंडोजी पाटील का स्वर्गवास हो गया। तब शत्रुसेनाओं द्वारा पीडित होकर अपने सेना के अत्यधिक अधीर हो जाने पर शिरखाण को मजबूत बांधकर, पगड़ी के पट्टे को खुला छोडकर, बाल को लेकर, कवच पहनकर, उन्नत, उत्कृष्ट धनुर्धर, भाला फेंकने में एवं क्रीडा में निपुण, ऐसा युद्ध कुशल महाबाहु शहाजी महाराज जैसे बादल पर बादल आरुद होता है, वैसे ही एक बड़े घोड़े पर सवार होकर बाजराज घोरपडे को मारने की इच्छा से शीघ्र उस पर आक्रमण किया।
दसों दिशाओं का विजेता, ग्वालों का राजा दसोजी, धनुष एवं बाण को धारण करने वाला योगाजी भाडकर, संताजी गुंजावटकर, मेघाजी ठाकूर, भाई त्र्यंबकराज एवं अभिमानी दत्तराज, इन्होनें एवं अन्य सैकडों सेनापतियों ने एवं अनेक पृष्ठभाग के रक्षकों ने चारों ओर से शहाजी राजा की रक्षा की।
खींचे हुए धनुष की टंकार से आकाश को प्रतिध्वनित करने वाला, सिंह जैसी गर्जन एवं बलवान जैसे कंधो वाला, त्र्यंबकराज एवं दत्तराज भाईयों द्वारा रक्षित, देवों ने जैसे इन्द्र की रक्षा की वैसे ही अपनी सेनाओं द्वारा रक्षित, प्रतिकूल वायु के प्रहार से शीघ्र ही हटाये गये उस वीर एवं बलशाली शहाजी राजा को बाजराज आदि ने देख लिया।
शस्त्र उठाये हुए शत्रुओं को अपने समीप देखकर शहाजी राजा ने सिंह की तरह गर्जना करके पृथ्वी एवं आकाश को प्रतिध्वनित कर दिया।
शहाजी के उस गर्जना से दिशाएं पूरित हो गई एवं समुद्र से भी उसकी प्रतिध्वनि निकलने से वह अचानक क्षुब्ध हो गया।
मदमस्त हाथी की गर्जना को जैसे मदमस्त हाथी सहन नहीं करता है, उसी प्रकार बाजराज घोरपडे को शहाजी राजा की गर्जना सहन नहीं हुई।
आकाशीय विद्युत की भयंकर कडकडाहट के समान गर्जना करते हुए समीप जाकर, अपने अपने नाम बताकर चमकदार एवं सुंदर ढाल को धारण किए हुए, कवचधारी, युद्धकुशल, घोरपडे आदि सेनापतियों ने जैसे बादल चंद्रमा को घेरता है उसी प्रकार उन्होंने पूरी तरह शहाजी को घेर लिया।
तब त्र्यंबकराज एवं दत्तराज, दसाजी एवं कार्तिकेय के समान तेजस्वी महाबाहु मेघाजी, योगाजी एवं गुंजावट आदि दूसरे वीरों ने शहाजी राजा की रक्षा करने की इच्छा से शत्रु योद्धाओं पर आक्रमण किया।
तत्पश्चात धनुर्धारी त्र्यंबकराज के साथ मानाजी, दुष्टों को जीतने वाला दत्तराज के साथ खंडोजी, शत्रु योद्धाओं को जीतने वाला योगाजी के साथ मालोजी, उसी प्रकार इंद्रजित के समान मेघाजी के साथ अंबाजी और शहाजी के साथ पराक्रमी बाजराज और दूसरे अनेक दीर्घबाहु वीरों के साथ दूसरे अनेक वीर लडने लगे।
परस्पर जीतने की इच्छा वाले वे मदमस्त महावीर धनुष की टंकार करके रणभूमि पर चमगादड की तरह नाचने लगे।
पदातियों के साथ पदाति, घुडसवारों के साथ घुडसवार, महावतों के साथ महावत, ऐसे अनेक योद्धा विजय की इच्छा से परस्पर भीड गये।
शक्तियों के शक्तियों पर, गाढमुष्टिवालों के गाढमुष्टिवालों पर, लोहबद्ध दंडवालों के लोहबद्ध दंडो पर, मुद्ररों के मुद्ररों पर, पट्टो के पट्टो पर, तोमरों के तीव्र तोमरों पर, गदा वालों के गदा वालों पर, हजारों चक्रों के चक्रों पर, बाणों के बाणों पर, कटार के कटार पर, भालों के भालों पर, इस प्रकार उस समय अनेक प्रहार होने लगे।
शिरस्त्राणों सहित सिर, कवचों के साथ वक्षःस्थल, दस्तानों सहित हाथ, केयूर सहित भुजाएं, पताकों के सहित ध्वज, बाणों के साथ धनुष, घुडसवारों सहित घोडे, महावतों सहित हाथी, ये दोनों पक्षों के अनेक मनुष्य, शत्रुओं के द्वारा फेंके गये अनेक शस्त्रो से छिन्न-भिन्न होकर उस समय भूमि पर गिरने लगे।
धनुष को खींचने वाले, जिनके हाथ में अंगुठियां थी, जिनके विस्तृत कन्धे थे, ऐसे राक्षसविशेष इधर उधर एक दूसरे पर दौडने लगे।
जिसका जिसने सिर एवं जो जो अवयव तोडकर नीचे गिराया, उसका वह वह अवयव उस समय उड़कर उस तोडने वाले पर दौडकर गया।
तीक्ष्ण बाणों से छिन्न भिन्न हुए घोडों के, हाथियों के, और मनुष्यों के कटे हुए शरीर से निकले रक्त का तालाब बन गया, मज्जा, मांस, चरबी, मेद, इनका पृथ्वी पर किचड बन गया, नाचने वाले पिशाचियों के साथ डाकिनी के कुल को अत्यंत हर्ष हुआ, अनेक सेनापतियों के कुंडलों को धारण करने वाला भैरवमंडल भैरवी के साथ अत्यंत मदमस्त हो गया, सूर्य के किरणों को भेद करके वीरों के मस्तकों की माला से सुशोभित शंकर को भूतगणों के साथ अत्यंत आनंद हुआ, खंडोजी राजा ने दत्तराज के हाथ तोड दिये, अहो! त्र्यंबकराज को मानाजी ने जीत लिया, उसी प्रकार अंबाजी के द्वारा किए गए प्रहार से भयभीत मेघाजी पीछे हट गया, दसाजी भी भाग गया, अगस्त्य मुनि द्वारा पीये हुए समुद्र की तरह अन्य सैन्य भय से आकुल होकर नष्ट हो गया, उसी प्रकार मलोजी के बाणों से भांडकर पीडित हो गया, ऐसी अवस्था देखकर शहाजी राजा ने बाजराज घोरपडे पर अपने तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की।
परतु पराक्रमी बाजराज, उस अत्यंत तीक्ष्ण एवं वेगवान् बाणों की वर्षा से छिन्न भिन्न होते हुए भी अचेत नहीं हुआ।
तत्पश्चात् उस समय चमकदार कवच पहने हुए शहाजीराजा को देखकर उसके छाती पर अपने भाले से प्रहार किया।
युद्ध विद्या में कुशल एवं वज्र के लिए भी अभेद्य शरीरवाला वह शहाजी राजा उस भाले के प्रहार से व्यथित नहीं हुआ।
तब बाण, शक्ति, गदा, तलवार, भाले, आदि शस्त्रों को धारण करने वाले, क्रोधित एवं अपने पराक्रम को दिखाने वाले, बाजराज की रक्षा करने वाले मानाजी आदि योद्धाओं ने पराक्रमी शहाजी राजा को घेर लिया।
वहां प्रलयाग्नि ज्वाला के समान स्पर्श करने वाले तीक्ष्ण बाणों से सब को प्रतापी शहाजी राजा ने त्रस्त कर दिया।
उस समय शहाजी राजा ने अपने बाणों से जिसके तुकडे तुकडे कर दिये थे, जिनकी भुजाएं तुटकर गिर गई थी, जो शरीर से बहने वाले खून से लथपथ थे, ऐसे सैकडों सैनिक, जैसे प्रचंड वायु के प्रहार से सथः पुष्पित पलस के वृक्ष उखडकर गिर जाते उसी प्रकार सैनिक बाजराज के सामने गिर गये।
दौडते हुए घोडे पर बैठा हुआ वह शहाजी राजा जहां जहां गया वहां वहां भयभीत हजारों शत्रुवीरों का वज्रप्रहार से विदीर्ण हुए पर्वत के समान दश, सौ, तुकडे किये।
तत्पश्चात किसी ने शहाजी राजा के नौकर को, किसी ने उसके मित्र को, किसी ने उसके अप्रतिम कवच को, किसी ने उसके चंद्र युक्त ढाल को, फिर किसी घोरपडे ने धनुष एवं बाणों को, किसी ने उसकी उच्च ध्वजा को तोड दिया।
शीघ्र ही घोडे से कूदकर गरुड की तरह झडप करने वाले तथा बाणों से विदीर्ण हुए शरीर से बहनेवाले रक्त से लथपथ एवं बहुत देर तक युद्ध करने के परिश्रम से मूर्च्छा को प्राप्त हुए, ऐसे महानाहु शहाजी राजा के भूमि का आलिङ्गन करने पर, शत्रुसमूह गर्जना करने लगा एवं भुजाओं को बजाने लगा और भोसले के सैनिकों में बड़ा हाहाकार मच गया।
मानो लोक का सर्वस्व, सभी जनों का आधार, दुर्भाग्य के कारण आकाश से गिरे हुए तेजस्वी सूर्य के समान मूर्च्छा पाकर भूमि पर गिरे हुए उस शहाजी राजा की बलशाली ने वेगपूर्वक घोडे से कूदकर तथा भातृभाव को दिखाकर अपने ढाल से उसकी रक्षा की तब बाजराज मुस्कुरा रहा था।
जैसे गरुड फुस फुस करने वाले सांप को पकडता है, वैसे ही वास प्रश्वास ग्रहण करने वाले उस महाबाहु शहाजी राजा को शत्रु, हाथी पर डालकर ले गये।
जो मूर्छा को प्राप्त हो गया है, जिसका मुंह शुष्क हो गया है, जिसकी आंखे बंद है, कपट करने में चतुर, दुष्ट मुस्तुफखान ने जिसको फंसाया, ऐसे उस शहाजी राजा को पकड़कर सिंह के समान पिंजरे में डालकर लाते हुए देखकर लोग अत्यधिक आक्रोश करने लगे।
जिस मुस्तुफाखान ने अपने कपटरूपी वस्त्र से जिस राजा को ढक दिया है, ऐसे सर्ववेत्ता उस शहाजी को कुछ ज्ञात नहीं हुआ ऐसा हमें प्रतीत होता है।
स्वामिकार्य के इच्छुक मुस्तुफखान ने शहाजी को विश्वास दिलाने के लिए अपने पुत्र आतशखान की शपथ ली एवं अपने कुराण के नियम का उल्लंघन किया।
इसलिए वह जनता उस यवन की सर्वत्र निंदा करने लगी, परंतु वह स्वामिकार्य का इच्छुक मात्र कृतकृत्य हो गया।
जिनकी काठी नही है, घोडा नहीं है, हाथी नहीं है, ऊंट नहीं है, शख नहीं है, शत्रधारी भी नहीं है, वाद्य नहीं है, और नहीं वादक है, मंच नहीं है, छत नहीं है, पताका नहीं है, ध्वज नहीं है, बेचने की वस्तु नहीं है, बेचनेवाला नहीं है, इंधन नहीं है, कीलक नहीं है, मंडप नहीं है, ऐसी आधे क्षण में ही शहाजी राजा के शिबिर की अवस्था हो गई।
प्रलयकाल के अग्नि के समान, प्रचंड एवं यमराज की तरह क्रूर ऐसे उस मुस्तुफाखान आदि सेनापति इंद्र की तरह पराक्रमी उस अभिमानी शहाजी राजा को युद्ध में कैद किया है, ऐसा अपने दूत से सुनकर महमूद आदिलशाह अत्यंत आनंदित हुआ।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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