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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 28
तमथाकृष्टकोदण्डट‌ङ्कारोड्रंकिताम्बरम्। वीरं कण्ठीरवग्रीवं वृषस्कन्धं महौजसम्।। दत्तत्र्यंबकराजाभ्यां भ्रातृभ्यां परिवारितम्। सैनिकैः स्वैः परिवृत्तं सुरैरिव शतक्रतुम् ।। मरुता प्रतिकूलेन सपदि प्रतिवारितम्। ददृशुश्श्साहनृपतिं बाजराजादयो नृपाः ।।
खींचे हुए धनुष की टंकार से आकाश को प्रतिध्वनित करने वाला, सिंह जैसी गर्जन एवं बलवान जैसे कंधो वाला, त्र्यंबकराज एवं दत्तराज भाईयों द्वारा रक्षित, देवों ने जैसे इन्द्र की रक्षा की वैसे ही अपनी सेनाओं द्वारा रक्षित, प्रतिकूल वायु के प्रहार से शीघ्र ही हटाये गये उस वीर एवं बलशाली शहाजी राजा को बाजराज आदि ने देख लिया।
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