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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 10
आमुक्तकवचः श्रीमानभेद्यफलकोजुरः । कृतहस्तः कुन्तधरः कृपाणी कर्मकोविदः ।। स तूर्ण तुरगारुढो रणाङ्गणमगाद्यदा। सिंहनादं नदन्ति स्म वाजराजादयस्तदा।।
शरीर पर कवच धारण किया हुआ, दृढ ढाल के कारण अभेद्य, भाला धारण करने वाला, उत्तम धनुर्धर, तलवार से युक्त, युद्धकुशल ऐसा प्रख्यात खंडोजी जब शीघ्र घोडे पर बैठकर रणभूमि पर गया तब बाजी घोरपडे आदि ने सिंह जैसी गर्जना की।
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