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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 49
ततः परिचरं कश्चित् कश्चित् सहचरं पुनः। वर्म चाप्रतिमं कश्चित् कश्विच्चर्म सचन्द्रकम् ।। ततो घोरपटः कश्चिदिषुधिं च शरासनम्। चिच्छेद शाहराजस्य कश्चिच्च ध्वजमुन्नतम् ।।
तत्पश्चात किसी ने शहाजी राजा के नौकर को, किसी ने उसके मित्र को, किसी ने उसके अप्रतिम कवच को, किसी ने उसके चंद्र युक्त ढाल को, फिर किसी घोरपडे ने धनुष एवं बाणों को, किसी ने उसकी उच्च ध्वजा को तोड दिया।
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