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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 48
उत्पतत्तुरगारुढो यन्त्र यत्रोत्पपात सः। तत्र तन्त्र परित्रस्य प्रतिवीरास्सहस्रशः ॥ पर्वता इव संशीर्णाः पविपातपराहताः। समजायन्त दशथा शतधा च सहस्रधा ।।
दौडते हुए घोडे पर बैठा हुआ वह शहाजी राजा जहां जहां गया वहां वहां भयभीत हजारों शत्रुवीरों का वज्रप्रहार से विदीर्ण हुए पर्वत के समान दश, सौ, तुकडे किये।
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