न पल्याणं न तुरगो न करी न क्रमेलकः। नायुधं नायुधीयश्च न वाद्यं न च वादकः ।। न मञ्चको न चोल्लोचो न पताका न च ध्वजः। न विक्रेयं न विक्रेता नेंधने न च कीलकः ॥ न काण्डपटकस्तत्र न चासीत्पटमण्डपः। तथाभवत् क्षणार्धेन शाहस्य शिबिरं तदा।।
जिनकी काठी नही है, घोडा नहीं है, हाथी नहीं है, ऊंट नहीं है, शख नहीं है, शत्रधारी भी नहीं है, वाद्य नहीं है, और नहीं वादक है, मंच नहीं है, छत नहीं है, पताका नहीं है, ध्वज नहीं है, बेचने की वस्तु नहीं है, बेचनेवाला नहीं है, इंधन नहीं है, कीलक नहीं है, मंडप नहीं है, ऐसी आधे क्षण में ही शहाजी राजा के शिबिर की अवस्था हो गई।
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