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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 51
सर्वस्वमिव लोकस्य सर्वस्यापि समाश्रयम्। तं महीतलसंलग्न मग्नं मोहमहोर्मिषु।। दैवाद्दिवस्तटादेवं दिवाकरमिव च्युतम्। स्याद्धयादवप्लुत्य बान्धवत्वं प्रकाशयन्।। फलकेन स्वकीयेन ररक्ष बलजिइली। अथ शाहं महाबाहुं बाजराजः स्मयं तथा ।।
मानो लोक का सर्वस्व, सभी जनों का आधार, दुर्भाग्य के कारण आकाश से गिरे हुए तेजस्वी सूर्य के समान मूर्च्छा पाकर भूमि पर गिरे हुए उस शहाजी राजा की बलशाली ने वेगपूर्वक घोडे से कूदकर तथा भातृभाव को दिखाकर अपने ढाल से उसकी रक्षा की तब बाजराज मुस्कुरा रहा था।
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