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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 5
अथ खण्डजिता चांबुजिता मानजिता तथा। सहितो बन्धुभिश्चान्यैः सैनिकैश्च समन्ततः ।। चन्द्रहासधरैश्वापधरैः प्रासधरैरपि। अग्नियन्त्रधरैश्चक्रधरैश्च पुरुषैर्वृतः ।। घोरकर्मा घोरफटो बाजराजो महाभुजः। वाडवो जसवन्तश्च वाडवाग्निरिवापरः ।। मल्लजिन्नरपालश्च प्रवारकुळदीपकः। ख्यातच तळजिन्नाम नृपो भृशवलान्वयः ॥ अध्यासितसगर्वार्वखुरक्षुण्णवसुन्धराः। विविशुः शाहशिबिरं सर्वेऽमी बलिना बराः ॥
तत्पश्चात् खंडोजी, अंबाजी, मनाजी ये मित्र तथा अन्य सैनिकों सहित, ओर तलवारों, धनुषों, भालों, बंदुकों एवं चाको को धारण करने वाले पुरुषों से घिरा हुआ वह घोरकर्मा महाबाहु बाजराज घोरपडे, मानो दूसरा वडवानल ही हो ऐसा यशवंतराव वाढवे, पवार कुल के दीपक मालोजी राजा, विख्यात तुकोजी राजा, राजा भोसले ऐसे ये सभी बलिष्ठ सेनापति अपने बैठे हुए घोडो के सुरों से पृथ्वी को चूर्ण करते हुए शहाजी के शिबिर में प्रविष्ट हुये।
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