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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 1
अथ कोकवियोगार्तिहरेबंधूकभास्वरे। पूर्वपर्वतश्रृंगाग्रमारुरुक्षतिभास्करे।। प्रभातसंध्यारागेण रंजिते गगनाङ्गने। तमस्तमीचरमुखप्रमुक्ते ककुभाङ्गणे ।। दरांदोलितपम्पाम्भः कणसंपर्कशीतले । फुल्लदम्भोरुहामोदमधुरे वाति मारुते ।। दिलावरो मसूदश्च सरजा याकुतोऽम्बरः । आदवन्याधिनाथश्च तथा कर्णपुराधिपः ।। फरादः कैरतश्चोभौ तथा याकुतसारभिः । आजमो बहुलोलश्च मानी मलिकराहनः ।। राघवो मम्बतनयो वेदजिद्भास्करात्मजः । सुतो हैबतराजस्य बल्लाळश्च महाबलः ।। त्रयोऽप्येतेऽग्रजन्मानः सैनिकाग्न्याः सुदुर्मदाः। प्रवारी सिद्धभम्बाह्वौ मम्बो भृशबलस्तथा।। अन्येऽप्यनीकपतयः तत्तदन्वयसंभवाः । यदा युद्धमदावेशवशात्मानो महायुधाः ।। कम्पयन्त इवाकाशं पताकापटमण्डलैः। क्षोदयन्त इव क्षोणीं चलैर्हयखुरांचलैः ।। दिधक्षन्त इवाशेषां त्रिलोकीं तेजसां चयैः। प्राकारमिव कुर्वन्तः परित प्रबलैर्बलैः ॥ पावका इव दीव्यन्त कृतान्त इव निर्भयाः । शिबिरं शाहराजस्य रुरुधुर्मुस्तुफाज्ञया ।।
चक्रवाक, पक्षी के वियोग से उत्पन्न दुःख को हरन करनेवाला, कांतिमान सूर्य के उदयांचल शिखर के अग्रभाग पर आरूढ होने के लिए आतुर होने पर, प्रभात के संध्याराग से गगनरुपी आंगन में लालिमा के आने पर, अंधकाररुपी निशाचर से सभी दिशाओं के मुक्त होने पर, मानो भय से आंदोलित पंपासरोवर के जलकणों के संपर्क से शीतल एवं विकसित कमलों की सुगंधि से आह्लाददायी वायु बह रही थी। ऐसे समय पर दिलावरखान, मसूदखान, सरजाखान याकुखान, अंबरखान, अदवनी का राजा, कर्णपूर का राजा फरादखान एवं कैरातखान ये दोनो, उसी प्रकार याकुतसार, आजमखान एवं बहुलोल अभिमानी मलिक शहनखान, राघव मंबाजी, वेदोजी भास्कर, और हैवत राजा का पुत्र महाबलशाली बल्लाल, इस प्रकार तीनों मदोन्मत्त ब्राह्मण सेनापति सिधोजी एवं मंबाजी पवार, मंबाजी भोसले और भिन्न-भिन्न कुलों के दूसरे सेनापतियों के शरीर में युद्ध का जोश व्याप्त होने से बडे बडे शखों को धारण करके अपने ध्वजों के समूहों से आकाश को कंपाते हुए, घोडों के खुरों के अग्रभाग से मानों पृथ्वी को चूर्ण करते हुए, अपने तेजोमय कांति से संपूर्ण त्रिभुवन को मानो जलाते हुए, प्रबल सैन्यबल से मानों चारों ओर अभेद्य दीवार बनाते हुए, अग्नि के समान तेजस्वी एवं यमराज के समान निर्भय ऐसे इन सेनापतियों ने मुस्तुफाखान की आज्ञा से शहाजी राजा के शिबिर को चारों ओर से घेर लिया।
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