चक्रवाक, पक्षी के वियोग से उत्पन्न दुःख को हरन करनेवाला, कांतिमान सूर्य के उदयांचल शिखर के अग्रभाग पर आरूढ होने के लिए आतुर होने पर, प्रभात के संध्याराग से गगनरुपी आंगन में लालिमा के आने पर, अंधकाररुपी निशाचर से सभी दिशाओं के मुक्त होने पर, मानो भय से आंदोलित पंपासरोवर के जलकणों के संपर्क से शीतल एवं विकसित कमलों की सुगंधि से आह्लाददायी वायु बह रही थी। ऐसे समय पर दिलावरखान, मसूदखान, सरजाखान याकुखान, अंबरखान, अदवनी का राजा, कर्णपूर का राजा फरादखान एवं कैरातखान ये दोनो, उसी प्रकार याकुतसार, आजमखान एवं बहुलोल अभिमानी मलिक शहनखान, राघव मंबाजी, वेदोजी भास्कर, और हैवत राजा का पुत्र महाबलशाली बल्लाल, इस प्रकार तीनों मदोन्मत्त ब्राह्मण सेनापति सिधोजी एवं मंबाजी पवार, मंबाजी भोसले और भिन्न-भिन्न कुलों के दूसरे सेनापतियों के शरीर में युद्ध का जोश व्याप्त होने से बडे बडे शखों को धारण करके अपने ध्वजों के समूहों से आकाश को कंपाते हुए, घोडों के खुरों के अग्रभाग से मानों पृथ्वी को चूर्ण करते हुए, अपने तेजोमय कांति से संपूर्ण त्रिभुवन को मानो जलाते हुए, प्रबल सैन्यबल से मानों चारों ओर अभेद्य दीवार बनाते हुए, अग्नि के समान तेजस्वी एवं यमराज के समान निर्भय ऐसे इन सेनापतियों ने मुस्तुफाखान की आज्ञा से शहाजी राजा के शिबिर को चारों ओर से घेर लिया।
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