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शिवभारतम् • अध्याय 12 • श्लोक 26
क्रूरया कार्तिकेयस्य शक्त्येव क्रौंचपर्वते। बाजराजस्य गदया तया भित्वा निपातिते।। त्रिदशस्यन्दनारूढे सुभटे खंडपाटले। हन्यमानेन सैन्येन स्वसैन्ये चाति-विव्हले ।। हतसंबध्दशीर्षण्यस्रस्तोष्णीषपटाञ्चलः । चर्मवान् वर्मवानुच्यः शरासनवतां वरः ॥ कुन्तयोधी मण्डलाग्रमण्डलीकारपारगः। शाहराजो महाबाहुर्महाराजो महाहवः ।। अधिरुह्य महावाहमंबुवाहमिवाम्बुदः। सपदि प्रतिजग्राह बाजराजं जिघांसया।।
कार्तिकय की तीक्ष्ण शक्ति क्रौंच पर्वत पर जैसे गिर जाती है, वैसे ही बाजराज की गदा से भिन्न होकर गिर जाने पर, उस उत्कृष्ट खंडोजी पाटील का स्वर्गवास हो गया। तब शत्रुसेनाओं द्वारा पीडित होकर अपने सेना के अत्यधिक अधीर हो जाने पर शिरखाण को मजबूत बांधकर, पगड़ी के पट्टे को खुला छोडकर, बाल को लेकर, कवच पहनकर, उन्नत, उत्कृष्ट धनुर्धर, भाला फेंकने में एवं क्रीडा में निपुण, ऐसा युद्ध कुशल महाबाहु शहाजी महाराज जैसे बादल पर बादल आरुद होता है, वैसे ही एक बड़े घोड़े पर सवार होकर बाजराज घोरपडे को मारने की इच्छा से शीघ्र उस पर आक्रमण किया।
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