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अध्याय 7 — सप्तमोल्लासः

कुलार्णव
64 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! हे करुणा के समुद्र! बटुकादि को बलि और शक्ति के लक्षण तथा उनके द्रव्य स्वीकार के सम्बन्ध में भी मुझे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से तत्त्वज्ञान प्रकाशित होता है।
हे कुलेश्वरि! जब तक बटुक को बलि नहीं दी जाती, तब तक ध्यान और पूजन करने से भी किसी देवता की तृप्ति नहीं होती।
अतः बटुकादि का उनके मन्त्रविधान से गन्ध, पुष्प, अमृत, आसव और आमिष से पूजन कर देवता की प्रसन्नता को प्राप्त करे।
पूजा एवं भोग के लिये जो भी द्रव्यसामग्री लाई गई हो, हे कुलेश्वरि! उसे भक्तिपूर्वक क्षेत्रपालों को प्रदान करे।
अब बटुक के मन्त्रों को कहूँगा। हे कुलनायिके! सुनिए! इन मन्त्रों से पूजन करने मात्र से सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
तीन प्रणव (ॐ), उसके बाद देवीपुत्र, फिर 'बटुकनाथ कपिल जटाभारभास्करपिङ्गल', फिर त्रिनेत्र, इसके बाद 'ज्वालामुख' पद, फिर 'इमां पूजां बलिं' के बाद दो 'गृहण गृहण' फिर स्वाहा पद कहे। (ॐ ॐ ॐ देवीपुत्र बटुकनाथ कपिलजटाभार-भास्वर पिङ्गल त्रिनेत्र ज्वालामुख । इमां पूजां बलिं गृण गृहण स्वाहा।) यह ४४ अक्षरों का बटुकमन्त्र है। इससे बलि देकर निम्न मन्त्र से प्रार्थना करे। बलिदानेन सन्तुष्टो वटुकः सर्वसिद्धिदः । शान्तिं करोतु मे नित्यं भूतवेतालसेवितः ।।
ॐ ॐ ॐ सर्वयोगिनीभ्यः सर्वभूतेभ्यः सर्वभूताधिवर्त्तिताभ्यः डाकिनीभ्यः शाकिनीभ्यः त्रैलोक्यवासिनीभ्यः इमां पूजां बलिं गृहण गृहण स्वाहा। हे महेशानि! यह ५० अक्षरों का योगिनीमन्त्र कहा गया है। इससे बलि देकर निम्न मन्त्र से प्रार्थना करे:- या काचिद् योगिनी रौद्रा सौम्या घोरतरा परा । खेचरी भूचरी व्योमचरी प्रीतास्तु मे सदा ॥
सर्वभूतपति बलि के मन्त्र - ॐ ॐ ॐ सर्वभूतेभ्यः सर्वभूतपतिभ्यो स्वाहा। यह १७ अक्षरों का मन्त्र है। इससे बलि देकर प्रार्थना करे:- भूता ये विविधाकारा दिव्या भौमान्तरिक्षगाः । पातालसंस्था ये केचिच्छिवयोगेन भाविताः ।। ध्रुवांद्याः सत्यसन्धाश्च इन्द्राद्याः स्वर्व्यवस्थिताः । तृप्यन्तु प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिम् ।।
क्षेत्रपालबलि के मन्त्र - ॐ ॐ ॐ देहि देहि देवीपुत्राय बटुकनाथाय उच्छिष्टहारिणे सर्वविघ्नान् नाशय नाशय गृहण गृह्मण रुरु क्षेत्रपाल सर्वोपचार-सहितामिमां पूजां बलिं गृहण गृहण स्वाहा। हे प्रिये! यह ६४ अक्षरों का सर्वसिद्धिप्रदायक क्षेत्रपाल का मन्त्र है। इससे बलि देकर प्रार्थना करे:- योऽस्मिन् क्षेत्रे निवासी च क्षेत्रपालस्य किङ्करः । प्रीतोऽयं बलिदानेन सर्वरक्षां करोतु मे ॥
राजराजेश्वर बलि का मन्त्र - ॐ ॐ ॐ ह्सौः स्हौः ह्रां ह्रीं हूं भैरवाधिष्ठिताय अक्षोभ्यानन्द हृदयाभीष्टदः सिद्धार्थ अवतर अवतर क्षेत्रपाल महाशान्त मातृपुत्र कुलपुत्र सिद्धिपुत्र अस्मिन् स्थानाधिप ग्रामाधिपतये अस्मिन् देशाधिपतये वटुकनाथ देवीपुत्र मेघनाद प्रचण्डोग्रकपाली भीषण सर्वविघ्नाधिपतये इमां पूजां बलिं गृह्मण गृहण कुरु कुरु मम दूरय दूरय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वविघ्नान् नाशय नाशय क्षां क्षं बुद्धिं क्षेत्रपालाय वौषट् हूं। यह १६० अक्षरों का मात्र है ॥
ॐ ॐ ॐ अमुकक्षेत्रपाल राजराजेश्वर इमां पूजां बलिं गृह्मण गृहण स्वाहा। यह २८ अक्षरों का मन्त्र है। इनसे वटुवंशसमन्वित राजराजेश्वर को बलि देकर प्रार्थना करे:- अनेन बलिदानेन वटुवंशसमन्वितः । राजराजेश्वरो देवो मे प्रसीदतु सर्वदा ।।
बटुकादि बलि देने के स्थान - बटुक को पश्चिम में, योगिनी को उत्तर में, सर्वभूत को पूर्व में और क्षेत्रपाल को दक्षिण में बलि देकर, हे कुलनायिके! मध्य में राजराजेश्वर की पूजा करे।
बटुकादि बलि में अंगुलि नियम - हे प्रिये! अंगुष्ठ अनामिका से वटुक को, तर्जनी, मध्यमा, अनामा, अंगुष्ठ से योगिनी को, सभी अंगुलियों से सर्वभूत को, अंगुष्ठ तर्जनी से क्षेत्रपाल को और अंगुष्ठ मध्यमा से राजराजेश्वर को बलि दे।
कुलदीप के लक्षण और मन्त्र - वटुकादि का पूजन कर कुलदीपों का अर्चन करे। चार अंगुल बड़े डमरु के आकार के तीन कोने वाले सुन्दर नौ, सात या पाँच दीपक हलके लाल रंग के आटे से बनाये। दीपक ऐसे हों कि उनमें एक कर्ष (तोला) घी आ जाय। फिर अन्तस्तेज को बहिस्तेज से मिलाते हुए अमित प्रभा वाले कुलदीपकों को तीन बार देवी के ऊपर घुमाकर इस मन्त्र से निवेदित करे:- समस्तचक्रचक्रेशि ! देवेशि। सकलात्मिके ! आरात्रिकमिदं देवि ! गृहाण मम सिद्धये ॥
कुलदीपों को प्रदर्शित कर साधक अब शक्ति की पूजा करे। स्वशक्ति या वीरशक्ति या विशेष रूप से दीक्षित शक्ति को पान कराकर साधक गुरु परम्परा से स्वयं पान करे। यह शास्त्र का निर्णय है।
हे अम्बिके! साधक अदीक्षित स्त्री का तुरन्त संस्कार करे। मन्त्रदीक्षा की विधि से वह शुद्ध होती है, अन्य प्रकार से नहीं।
अतः सुलक्षणा शक्ति को देवता मान कर गन्ध पुष्पाक्षत आदि से उसका पूजन कर उसे भोगपात्र प्रदान करे।
उसके बाद सुन्दर कन्याओं और स्त्रियों को भी देवतास्वरूप मानकर उनकी पूजा कर उनमें से प्रत्येक को अलग अलग पात्र प्रदान करे।
जो शक्ति को बिना दिये कुलद्रव्य का सेवन करता है, उसकी पूजा निष्फल होती है और देवता प्रसन्न नहीं होते।
आठ कुलशक्तियाँ - १ चाण्डाली, २ चर्मकारी, ३ मातङ्गी, ४ पुक्कसी, ५ श्वपची, ६ खट्टकी, ७ कैवर्ती, ८ विश्वयोषिता - ये आठ कुलशक्तियाँ 'कुलाष्टक' कही गई हैं।
आठ अकुल शक्तियाँ - १. कन्दुकी, २. शौण्डिकी, ३. शस्वजीवी, ४. रजको, ५. गायकी, ६. रजकी, ७. शिल्पी, ८. कौलिकी - ये आठ अकुल शक्तियाँ 'अकुलाष्टक' कही गई हैं।
तन्त्र-मन्त्र की ज्ञाता, समयाचार का पालन करने वाली, कुमारी अथवा व्रतधारिणी या योगिनी जो शक्ति पूजाकाल में स्वयं ही उपस्थित हो जाय, विद्वानों द्वारा वह 'सहजा' शक्ति कही गई है।
उक्त शक्तियों में से किसी भी शक्ति के न होने पर अर्थात् उक्त शक्तियों का अभाव होने पर चारों वर्ण में से किसी भी वर्ण की स्त्री का पूजन करे।
'सुलक्षणा' शक्ति वह है, जो सुन्दर रूप वाली, तरुणी, शान्ता, कुलाचार परायणा, पवित्रा, शङ्कत से हीन, भक्तियुता, गूढ़ रहस्य-युता, शास्त्र को मानने वाली, लोभहीना, सुशीला, जिसके मुख पर मुस्कान हो, मधुरभाषिणी, गुरु और देवता की भक्ति से युक्त, अच्छे विचार बाली, कौलिकों को चाहने वाली, ईर्ष्या एवं द्वेष से रहिता, विशेष बातों की जानने वालो, देवाराधन में रुचि रखने वाली, मनोहरा और सदाचारिणी हो।
जो शक्ति दुष्टा, उग्रा, कर्कशा, क्रूरा, दुःखिता, कुल को दूषित करने वाली, दुराचारिणी, पराधीना, डरी हुई, लोभिनी, व्याकुला, आलसी, निद्रा में रुचि रखने वाली, दुर्बुद्धि वाली, अङ्गहीना, रोगिणी, दुर्गन्धा, कुरूपा, मूर्खा, बूढ़ी, पगली, रहस्य की बातों को भी कहने वाली, कुतर्किणी, गन्दी बात करने वाली, निर्लज्जा, झगड़ालू, विकृत रूप वाली, गलत मार्ग पर चलने वाली, चुप रहने वाली, लँगड़ी, अन्धी, विकृत मुख वाली हो, वह मन्त्रयुक्ता भी हो, तो उसे पूजायाग में न रखे।
हे प्रिये! तब समस्त अर्चनादि को अभिमन्त्रित जल से ७३ अक्षरों वाले निम्न मन्त्र द्वारा देवी को समर्पित करे:- ॐॐॐॐॐ इतः पूर्व प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतः जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु मनसा चेतसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना च यत् स्मृतं यत्कृतं यदुक्तं तत् सर्वं गुरवे समर्पितमस्तु स्वाहा ॥
क्षमाप्रार्थनामन्त्र:- ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यन्मया क्रियते शिवे । तव कृत्यमिदं सर्वमिति ज्ञात्वा क्षमस्व मे ॥
हे देवेशि! इस प्रकार प्रार्थना कर स्तुतिपूर्वक भक्ति से नमस्कार कर प्रधान देवता की मूर्ति में उनके परिवारों का अर्चन करे। आवरणसहित अपने हृदयकमल पर देवी का ध्यान कर 'शेषिका' (Remainder) को समर्पित कर मूलमन्त्र से अपने को शुद्ध करे।
शेषिका का मन्त्रー ऐं नमः उच्छिष्टचाण्डालि मातङ्गि ! सर्वं ते वश्यं कुरु कुरु ।। यह २१ अक्षरों का शेषिका मन्त्र है। इस मन्त्र से शेषिका को निर्माल्य समर्पित करे। फिर त्रैलोक्यमोहिनी देवी उच्छिष्टमातङ्गी का ध्यान करे। यथा:- वीणावाद्य, विनोद एवं गीत में तत्पर, नीले वस्त्रों से कान्तिमती, बिम्ब के समान अधरोष्ठों वाली, अलक्तक से आर्द्र चरणों वाली, केश पाशों को बिखेरे हुए, मृदु अंगों वाली श्वेत शङ्ख एवं कुण्डलों को धारण करने वाली, माणिक्य जटित उज्ज्वल आभूषणों से भूषित, सुन्दरस्मित युक्त मुख वाली, शुक के समान श्यामल वर्ण की देवी मातङ्गी का ध्यान करना चाहिए।
तदनन्तर दोनों हाथों से पात्र उठा कर द्वितीयतत्त्व के साथ साक्षात् परशिवस्वरूप श्रीगुरुदेव को प्रदान करे।
अपने सम्प्रदाय वाले वीर साधकों के साथ गुरुदेव का पूजन कर एक दूसरे की वन्दना करते हुये गुरुदेव की अनुमति से पान करे।
दाहिने हाथ से पात्र को उठाकर बाएँ हाथ से मुद्रा बनाकर द्वितीय तत्त्व के साथ यथाविधि मन्त्रोच्चारण करते हुये उसे ग्रहण करे।
मांस माष (एक माशा) बराबर और द्रव्य एक चुल्लू बराबर लेकर तीन बार में अपनें देहत्रय (स्थूल, सूक्ष्म और पर) का शोधन करे।
हे प्रिये! इसके लिये तरुणोल्लास से युक्त, प्रसन्नमुख और कृपादृष्टिपूर्वक गुरुदेव शिष्यों को बुलाकर तीनों तत्त्व प्रदान करें।
हे प्रिये! शिष्य शुद्धात्मा से, धन की शठता से रहित यथाशक्ति पुष्पादि उपहार सामग्री लेकर गुरुदेव स्वरूप शिव को अर्पित कर उन्हें भक्तिपूर्वक मानसिक रूप से अन्तरात्मा में धीरे धीरे प्रवेश कर अष्टाङ्ग प्रणाम करे।
घुटनों के बल पृथ्वी पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों को अधित कर तर्जनी को आगे निकालकर गुरुदेव को पञ्चाङ्ग प्रणाम करे।
हे प्रिये! श्री गुरुदेव थोड़ा सिर झुकाकर अपने बाएँ हाथ की अंगुष्ठ, अनामा अंगुलियों से शिष्य के दाएँ हाथ को फैलाकर स्पर्श करें और हे प्रिये! हे कुलेश्वरि ! शुद्ध हृदय से 'प्रकृति' आदि से 'पृथिवी' तक के २४ तत्त्वों द्वारा और वाग्भव (एँ) बीज से युक्त स्वरों द्वारा आत्मतत्त्व से शिष्य के स्थूल देह का शोधन करें।
फिर 'माया' से 'पुरुष' तक के ७ शुद्धाशुद्ध तत्त्वों को कामराज (क्लो) से युक्त स्पर्श वर्णों द्वारा विद्यातत्त्व से शिष्य के सूक्ष्म देह का शोधन करें।
तदनन्तर 'शिव' से 'विद्या' तक के ५ शुद्ध तत्त्वों को परा (सौः) से युक्त व्यापक परशिवतत्त्व से परदेह का शोधन करे।
हे प्रिये! तब ३६ तत्त्वों सहित मालिनी बाला से सब तत्त्वों के आश्रय बीज से युक्त बीज का शोधन सब तत्त्वों से करे।
इसके बाद गुरुदेव शिष्य को द्वितीय सहित अलि (= मदिरा) देकर कहें - 'शोधय'। गुरु द्वारा प्रदत्त चुल्लू भर अलि (= मद्य) को 'सर्वतत्त्वं शोधयामि' कहते हुये शिष्य झुककर भक्तिपूर्वक तीन बार बिना कोई शब्द किये उस मद्य का पान करे और दोनों हाथों से देह को स्पर्श कर यह अनुभव करे कि शिर से पैर तक सारा शरीर शुद्ध हो गया है।
'आत्मतत्त्व' स्थूल देह तक रहता है। 'विद्यातत्त्व' सूक्ष्म शरीर तक दिखाई देता है और 'शिवतत्त्व' परदेह तक है। सारा जगत् तत्त्वत्रयात्मक है।
इस प्रकार गुरु से तत्त्वत्रय को जानकर जो व्यवहार करता है, वह जीवित ही मुक्त होता है यह शङ्कर (शास्त्र) वचन है।
तब गुरुदेव स्वयं ग्रहण कर शेष द्रव्य शिष्यों को प्रदान करें। गुरुदेव द्वारा प्रदत्त आसव को द्वितीय तत्त्व के साथ पान करे।
हे कुलनायिके! श्री गुरुदेव और ज्येष्ठ तथा पूज्य साधकों के सम्मुख बैठकर मद्य पान न करे। यह शास्त्र की आज्ञा है।
प्राणभेद के फलस्वरूप उल्लास, प्रणाम की स्थिति और लक्षण को जाने बिना जो आचरण करता है, वह आपत्ति में पड़ता है। मन्त्र के बिना आसव का पान न करे, अन्यथा प्रायश्चित्त करना पड़ता है। अतः हे कुलनायिके! निम्न मन्त्रविधान से पान करे।
पान करने का मन्त्र:- इदं पशुपाशसमुच्छेदकारणं पवित्रममृतं पिबामि भवभेषजम् । भैरवोदितम् ॥ चित्ते स्वातन्त्र्यसारत्वात् तदानन्दमयात्मनः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावश्चान्तर्हिता रसे ॥ सुषुम्नान्तं विकाशाय सुरसंस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूणर्णोऽहं त्वां पिबाम्यहम् ॥ हे देवेशि! इस मन्त्र और मूलमन्त्र का उच्चारण कर स्थिर म. से धीरे-धीरे साधक अलिपान करे ।
अपने मूलाधार के त्रिकोण में स्थित, कोटि सूर्यों के समान प्रभा बाली, कुण्डली की आकृति वाली चिरूपा में निम्न मन्त्र से द्रव्य का. हवन करे।
द्रव्य से हवन का यह मन्त्र है:- अहन्तापात्रभरितमिदन्तापरमामृतम् पराहन्तामये वहाँ होमस्वीकारलक्षणम् ।।
गुरु, देवता और मन्त्र में ऐक्य भाव का चिन्तन करते हुये, जब तक उल्लास उत्पन्न न हो, तब तक मधु का पान करे।
चुल्लू भर पान सिद्धिदायक है और दीप्ति होने तक पान करना ज्ञानदायक कहा गया है और पान से परम पद मिलता है। कौल सम्प्रदाय में ये तीन पर पद प्राप्तियाँ कही गई हैं।
भोजन के अन्त में मद्य और मद्यपान के अन्त में भोजन विष होता है सुरा के साथ जो अन्न लिया जाता है, उसे अमृत समझे।
हे प्रिये! चर्वण के साथ पान करना अमृत होता है और चर्वण के बिना पान करना केवल विष को बढ़ाता है।
१. दिव्य, २. वीर, ३. पशु - इस क्रम से पान तीन प्रकार का कहा गया है। देवी के आगे पान करना 'दिव्य', मुद्रासन के साथ पान करना 'वीर' और स्वेच्छापूर्वक पशु के समान पिया गया 'पशुपान' है।
हे प्रिये! 'दिव्यपान' मुक्ति-मुक्तिदायक होता है और 'वीरपान' भुक्ति दायक और 'पशुपान' नरकदायक होता है।
जब तक दृष्टि, मन, वाणी और शरीर में भ्रम उत्पत्र न हो, तब तक पान करे। इससे अधिक पशुपान होता है।
जब तक इन्द्रियों में विकलता न हो, मुख में विकृति न हो, तब तक मद्यपान करे। इससे अधिक पान करने से पतन होता है।
हे देवि! पूर्णाभिषिक्तों के पान की विधि कहता हूँ - दोनों हाथों से पात्र को उठाकर मूलमन्त्र और पादुका को स्मरण करे। कण्ठ तक पान करे, तो मुक्त होता है, इसमें सन्देह नहीं।
पी-पीकर पुनः पिये, तब तक पिए जब तक कि भूमि पर गिर न पड़े। उठकर फिर पिये, तो पुनर्जन्म नहीं होता।
आनन्द से देवी तृप्त होती है, मूर्च्छा से स्वयं भैरव और वमन से सभी देवता तृप्त होते हैं। अतः तीनों को संतृप्त करे।
दिव्य पान में तत्पर कुलयोगियों को जो सुख मिलता है, वह सार्वभौम राजा को भी नहीं मिलता।
हे वरानने! कुलद्रव्य के सेवन से जो सुख कुलनिष्ठों को मिलता है, वह सुख ही मोक्ष है, यह सत्य है।
इस प्रकार हे कुलेशानि! आपसे बटुक एवं शक्ति आदि के पूजन का कुछ संक्षिप्त वर्णन किया गया। अब आप क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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