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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 15
बटुकादीन् समच्यैवं कुलदीपान् प्रदर्शयेत् । ईषद्रक्त सुपिष्टेन चतुरङ्गुलिमानतः ॥ दीपान् डमरुकाकारान् त्रिकोणानतिशोभनान् । कर्षाज्यग्राहिणः कुर्यान्नव सप्ताथ पञ्च वा ॥ अन्तस्तेजो बहिस्तेज एकीकृत्यामितप्रभान् । त्रिधा देव्युपरि भ्राम्य कुलदीपान् निवेदयेत् ॥ समस्तचक्रचक्रेशि देवेशि सकलात्मिके । आरात्रिकमिदं देवि गृहाण मम सिद्धये ।
कुलदीप के लक्षण और मन्त्र - वटुकादि का पूजन कर कुलदीपों का अर्चन करे। चार अंगुल बड़े डमरु के आकार के तीन कोने वाले सुन्दर नौ, सात या पाँच दीपक हलके लाल रंग के आटे से बनाये। दीपक ऐसे हों कि उनमें एक कर्ष (तोला) घी आ जाय। फिर अन्तस्तेज को बहिस्तेज से मिलाते हुए अमित प्रभा वाले कुलदीपकों को तीन बार देवी के ऊपर घुमाकर इस मन्त्र से निवेदित करे:- समस्तचक्रचक्रेशि ! देवेशि। सकलात्मिके ! आरात्रिकमिदं देवि ! गृहाण मम सिद्धये ॥
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