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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 56
भुक्तियुक्तिप्रदं दिव्यं वीरं भुक्तिप्रदं भवेत् । पशुपानं नरकदं प्रोक्तं पानफलं प्रिये ॥
हे प्रिये! 'दिव्यपान' मुक्ति-मुक्तिदायक होता है और 'वीरपान' भुक्ति दायक और 'पशुपान' नरकदायक होता है।
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