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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 61
आनंन्दात्तृप्यते देवी मूर्च्छया भैरवः स्वयम् । वमनात् सर्वदेवाश्च तस्मात्रिविधमाचरेत् ॥
आनन्द से देवी तृप्त होती है, मूर्च्छा से स्वयं भैरव और वमन से सभी देवता तृप्त होते हैं। अतः तीनों को संतृप्त करे।
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