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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 48
इदं पवित्रममृतं पिबामि भवभेषजम् । पशुपाशसमुच्छेदकारणं भैरवोदितम् ॥ चित्ते स्वातन्त्र्यसारत्वात्तदानन्दमयात्मनः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावाश्चान्तर्हिता रसे ॥ सुषुम्नान्तं विकाशाय सुरसस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूर्णोऽहं त्वां पिबाम्यहम् ॥ मन्त्रेणानेन देवेशि मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् । अनाकुलमनाः कुर्यादलिपानं शनैः शनैः ॥
पान करने का मन्त्र:- इदं पशुपाशसमुच्छेदकारणं पवित्रममृतं पिबामि भवभेषजम् । भैरवोदितम् ॥ चित्ते स्वातन्त्र्यसारत्वात् तदानन्दमयात्मनः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावश्चान्तर्हिता रसे ॥ सुषुम्नान्तं विकाशाय सुरसंस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूणर्णोऽहं त्वां पिबाम्यहम् ॥ हे देवेशि! इस मन्त्र और मूलमन्त्र का उच्चारण कर स्थिर म. से धीरे-धीरे साधक अलिपान करे ।
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