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कुलार्णव • अध्याय 7 • श्लोक 30
स्याद्वाग्भवं हृदुच्छिष्टचाण्डालि तदनन्तरम् ॥ वदेन्मातङ्गि सर्वन्ते वश्यंकुरुयुगन्ततः । एकविंशतिवर्णैश्च शेषिकामनुरीरितः ॥ मन्त्रेणानेन निर्माल्यं शेषिकायै समर्पयेत् । देवीमुच्छिष्टमातङ्गीं ध्यायेत् त्रैलोक्यमोहिनीम् ॥ वीणावाद्यविनोदगीतनिरतां नीलांशुकोल्लासिनीं बिम्बोष्ठीं नवयावकार्द्रचरणामाकीर्णकेशालकाम् । मृद्वङ्गों सिंतशङ्खकुण्डलधरां माणिक्यभूषोज्ज्वलां मातङ्गीं प्रणतोऽस्मि सुस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलाम् ॥
शेषिका का मन्त्रー ऐं नमः उच्छिष्टचाण्डालि मातङ्गि ! सर्वं ते वश्यं कुरु कुरु ।। यह २१ अक्षरों का शेषिका मन्त्र है। इस मन्त्र से शेषिका को निर्माल्य समर्पित करे। फिर त्रैलोक्यमोहिनी देवी उच्छिष्टमातङ्गी का ध्यान करे। यथा:- वीणावाद्य, विनोद एवं गीत में तत्पर, नीले वस्त्रों से कान्तिमती, बिम्ब के समान अधरोष्ठों वाली, अलक्तक से आर्द्र चरणों वाली, केश पाशों को बिखेरे हुए, मृदु अंगों वाली श्वेत शङ्ख एवं कुण्डलों को धारण करने वाली, माणिक्य जटित उज्ज्वल आभूषणों से भूषित, सुन्दरस्मित युक्त मुख वाली, शुक के समान श्यामल वर्ण की देवी मातङ्गी का ध्यान करना चाहिए।
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